नोएडा: उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर नोएडा में हुए मजदूरों के एक विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किए गए 20 से 28 वर्ष की आयु के कई युवा पिछले पांच महीनों से लगातार जेल में बंद हैं। इस कार्रवाई की चपेट में आने वालों में स्थानीय फैक्टरियों में काम करने वाले आम मजदूर, छात्र और विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं।
पुलिस द्वारा इस विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और तोड़फोड़ के मामलों में कुल 11 एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थीं, जिनमें कई युवाओं पर गंभीर और गैर-जमानती धाराएं थोपी गईं। हालांकि इनमें से कुछ लोगों को कुछ मामलों में जमानत मिल चुकी है, लेकिन अन्य मामलों में दूसरी एफआईआर, जमानती न मिलने और लंबी कानूनी प्रक्रिया पूरी न होने के कारण वे अभी भी जेल की सलाखों के पीछे हैं।
बर्बादी की कगार पर पहुंचे युवाओं के परिवार
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इन गिरफ्तारियों का असर सिर्फ जेल तक सीमित नहीं रहा। अंशु कुशवाहा जैसे युवा, जो पढ़ाई के साथ परिवार का सहारा बनने के लिए नोएडा आए थे, उनकी नौकरी और पढ़ाई रुक गई। पांच महीने से वेतन नहीं मिला और परिवार को अलग-अलग मामलों में वकीलों की फीस के लिए कर्ज लेना पड़ा। उनके पिता रिश्तेदारों और पड़ोसियों से पैसे उधार लेकर बेटे की जमानत की कोशिश कर रहे हैं।
छात्रों और शोधार्थियों की संघर्ष गाथा
अमन सोनी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। ITI करने के बाद उन्होंने नोएडा में नौकरी शुरू की थी, लेकिन कुछ ही महीनों बाद जेल पहुंच गए। उन्हें कई मामलों में जमानत मिल चुकी है, फिर भी पर्याप्त जमानती न मिलने के कारण वह जेल से बाहर नहीं आ सके। उनकी कानूनी फीस जुटाने के लिए परिवार पर करीब ₹1.7 लाख का कर्ज भी हो चुका है।
इसी मामले में छात्र और कार्यकर्ता भी जेल में हैं। 25 वर्षीय लॉ स्टूडेंट आकृति चौधरी और 24 वर्षीय हिमांशु ठाकुर पर कई FIR दर्ज हैं। आकृति पर NSA भी लगाया गया था, जिसे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द किया था; बाद में सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई। हिमांशु की पढ़ाई और PhD इंटरव्यू की योजना गिरफ्तारी से प्रभावित हुई, हालांकि जेल में रहते हुए उन्होंने NET UGC परीक्षा में 99.3 पर्सेंटाइल हासिल किया।
भविष्य पर मंडराते संकट के बादल
स्पष्ट है कि नोएडा के इस विरोध प्रदर्शन के बाद हुई गिरफ्तारियों ने इन युवाओं के जीवन को झकझोर कर रख दिया है। मामला सिर्फ जेल जाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसी की नौकरी छूट गई, किसी का अकादमिक करियर अधर में लटक गया, तो परिवारों पर भारी कर्ज का बोझ बढ़ गया। महीनों बीत जाने के बाद भी कई युवा कागजी और कानूनी प्रक्रियाओं के फेर में फंसे हैं, जबकि जेल के भीतर कुछ युवा तमाम जिल्दनों के बावजूद अपने सपनों और भविष्य को बचाने की जद्दोजहद में जुटे हुए हैं।
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