विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस: वृद्धा आश्रम में रह रहे इन बुजुर्गों का आखिर कसूर क्या है?

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आज विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस है। हर साल 15 जून को विश्व स्तर पर इसे मनाया जाता है जिसका उद्देश्य बुजुर्ग लोगों के साथ दुर्व्यवहार और पीड़ा के विरोध में आवाज उठाना है। इसके प्रति लोगों को जागरुक कर बुजुर्गों के प्रति उनकी सोच बदलनी है जिससे बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार और उनकी उपेक्षा न हो।

भले ही हम इस दिवस को मना रहे हैं लेकिन इसके सार्थक परिणाम दिखाई नहीं देते आगरा शहर में ही आज एक नहीं बल्कि कई वृद्धा आश्रम खुल गए है। जहां अपनों के सताए और बच्चों के दुर्व्यवहार के कारण घर से निकाले गए सैंकड़ों बुजुर्ग गैरों के बीच में रहकर अपनी खुशी ढूंढते हैं। सुबह-शाम बुजर्गों की आंखों में झड़ते आंसू अपनों के दिए कष्ट को याद दिलाते हैं। आश्रमों में रहने वाले हर बुजुर्ग की अंतिम इच्छा है कि उनके आखिरी समय में अब भी अपनों के प्यार से दो मीठे बोल सुनने को मिल जाएं। यह उनके लिए वह बोल अमृत के समान होंगे।

15 जून को पूरे विश्व में विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरुकता दिवस मनाया जाता है। लोगों को जागरूक किया जाता है कि बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार न किया जाए। लेकिन आश्रम में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या के इस बात का सबूत है कि अपने ही बुजुर्ग माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। शहर में कई वृद्ध आश्रम खुल चुके हैं। शहर के समाजसेवी बुजुर्गों की सेवा करने के लिए तत्पर दिख रहे हैं, तो वहीं उनके खुद के बच्चे उनको रखने तक को भी राजी नहीं। सिकंदरा स्थित रामलाल वृद्ध आश्रम के अध्यक्ष शिवप्रसाद शर्मा बताते हैं कि उनके सबसे पुराने आवास विकास सेक्टर 10 वृद्धाश्रम में 30 बुजुर्ग, सिकंदरा वाले में 356 व नोएडा के आश्रम में 50 बुजुर्ग रह रहे हैं। अब तो हर दिन आश्रम में 1 या 2 बुजुर्ग रहने के लिए पहुंच रहे हैं।

दौलत के बावजूद सुख नहीं:-

रामलाल वृद्ध आश्रम में रह रही विद्या देवी बताती हैं कि ‘मेरे दो बेटे हैं उन दोनों की ही दो फैक्टरी है। धन-दौलत सभी चीज से संपन्न होने के बावजूद भी मैं पिछले दो साल से वृद्ध आश्रम में रह रही हूं। बेटे आज तक पूछने तक भी नहीं आए।’ कि मां तुम कैसी हो।

प्रताड़ना से मन दुखी:-

77 वर्षीय राज रानी गोयल ने कहा कि ‘पिछले 10 साल से आश्रम में रह रही हूं। दो बेटे हैं आज तक किसी ने हमारे बारे में पूछा तक भी नहीं। अब आश्रम के लोगों को ही मैं अपना परिवार मानती हूं। पर, बच्चों के द्वारा दी गई प्रताड़ना को याद कर आज भी मन दुखी हो जाता है।’




Dr. Bhanu Pratap Singh