मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) तैयार करते समय व्यापक सहमति जरूरी है और ऐसा कोई कदम नहीं उठना चाहिए जिससे समाज में मतभेद बढ़ें। वह संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे।
हाल के भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर उन्होंने कहा कि हर समझौते में लेन-देन का तत्व होता है और यह दोनों देशों के लिए लाभकारी होना चाहिए। उनके मुताबिक, यह देखना जरूरी है कि देश के हितों को नुकसान न पहुंचे।
वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग पर भागवत ने कहा कि यदि उन्हें यह सम्मान मिलता है तो पुरस्कार की गरिमा ही बढ़ेगी। उन्होंने यह भी कहा कि संघ के लिए आए सकारात्मक दौर का श्रेय स्वयंसेवकों की मेहनत और विचारों के प्रति उनकी निष्ठा को जाता है।
अपने पद को लेकर पूछे गए सवाल पर भागवत ने स्पष्ट किया कि यदि संगठन उनसे पद छोड़ने को कहेगा तो वह तुरंत ऐसा करेंगे। उन्होंने बताया कि 75 वर्ष की उम्र पूरी होने पर उन्होंने स्वयं इसकी जानकारी संगठन को दी थी, लेकिन संघ ने ही उनसे काम जारी रखने का आग्रह किया। उन्होंने दोहराया कि पद छोड़ा जा सकता है, लेकिन काम से विराम नहीं लिया जाएगा।
संघ में नेतृत्व चयन की प्रक्रिया पर उन्होंने कहा कि सरसंघचालक के लिए कोई औपचारिक चुनाव नहीं होता, बल्कि संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी मिलकर निर्णय लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि परिस्थितियां अनुकूल हों या विपरीत, जरूरत इस बात की है कि ध्यान समस्याओं पर नहीं बल्कि उनके समाधान पर रखा जाए।
हल्के अंदाज में उन्होंने कहा कि संघ अपने स्वयंसेवकों से पूरी क्षमता के साथ काम लेता है और अब तक ऐसी नौबत नहीं आई जब किसी को जबरन सेवानिवृत्त करना पड़ा हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ का काम संस्कार निर्माण है, चुनावी राजनीति करना नहीं।
प्रचार को लेकर भागवत ने माना कि संघ इस क्षेत्र में बहुत आक्रामक नहीं रहा। उनके अनुसार, जरूरत से ज्यादा प्रचार से अहंकार आ सकता है, इसलिए संतुलन जरूरी है। उन्होंने प्रचार की तुलना बारिश से करते हुए कहा कि वह समय और मात्रा दोनों में संतुलित होना चाहिए।
भाषा के सवाल पर उन्होंने कहा कि संघ के कामकाज में अंग्रेजी मुख्य माध्यम नहीं बनेगी क्योंकि यह भारतीय भाषा नहीं है। हालांकि जहां जरूरत होगी, वहां अंग्रेजी का इस्तेमाल करने में आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी सीखना जरूरी है, लेकिन अपनी मातृभाषा को भूलना ठीक नहीं।
उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि बेंगलुरु में बातचीत के दौरान दक्षिण भारत के कई प्रतिनिधि हिंदी नहीं समझ पा रहे थे, इसलिए उन्होंने अंग्रेजी में जवाब दिए। विदेशों में रहने वाले भारतीयों से संवाद भी उनकी सुविधा के मुताबिक हिंदी या उनकी मातृभाषा में किया जाता है।
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