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Agra, Uttar Pradesh, India. राष्ट्र संत नेपाल केसरी डॉ. मणिभद्र महाराज ने कहा है कि व्यक्ति में जब वैराग्य की भावना जाग्रत होती है तो उसकी दृष्टि बदल जाती है। सभी से मोह, ममता खत्म हो जाती है। राज-काज से आसक्ति भी समाप्त हो जाती है। लेकिन यह भाव बहुत कम लोगों में जाग्रत होते हैं।
न्यू राजामंडी के महावीर भवन में प्रवचन करते हुए जैन मुनि ने नवी राजा के वैराग्य की चर्चा की। उन्होंने कहा कि बड़े से बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, उसे दुनिया को छोड़ कर जाना ही होगा। वह कोई भी उपाय कर ले, उसकी मृत्यु निश्चित है। मृत्यु अटल सत्य है। यह जानते हुए भी लोग मानते नहीं हैं। संग्रह करते जाते हैं। संग्रह बिना पाप के नहीं किया जा सकता। इतने धन को एकत्र कर लेते हैं कि नोटों की गड्डियों पर सोते हैं, नींद फिर भी नहीं आती। बिना नींद की गोली के वे सो नहीं पाते। ऐसे धन संग्रह से क्या लाभ ? यह तो एक प्रतिस्पर्धा है। हर आदमी, दूसरे आदमी से बड़ा होना व दिखना चाहता है। संतुष्टि नहीं मिलती। लेकिन व्यक्ति बहुत स्वार्थी होता है।

नवी राजा का प्रसंग सुनाते हुए जैन मुनि ने कहा कि जब नवी राजा मोक्ष गामी हुए तो उनके राज्य में बहुत बड़ा कोलाहल मचने लगा। ब्राह्मण वेश में उनकी परीक्षा लेने आए देवराज इंद्र ने नवी राजा से पूछा ये कोलाहल कैसा। नवी राजा ने बताया कि जब वट वृक्ष तूफान या आंधी में गिरता है तो तमाम पशु, पक्षी आदि कोलाहल करते हैं। वे इसलिए नहीं करते कि पेड़ गिर गया, बल्कि उन्हें अपनी चिंता होती है कि अब उनका क्या होगा। कहां घोंसला बनाएंगे। उन्हें अब कहां आश्रय मिलेगा। इसी प्रकार मेरी प्रजा मेरे मरने के बाद हो हल्ला मचा रही है। उसे मेरा दुख नहीं है, उसे अपनी चिंता है कि अब उनका क्या होगा।
जैन मुनि ने कहा कि विसर्जन में पुण्य है। जितना हो सके, अन्न, धन का वितरण करो, उससे हमारे कष्टों में कमी आएगी। यह भी तभी होता है, जब आत्मा जागती है। उन्होंने कहा कि जब किसी के पास दुख आता है तो यह नहीं समझना चाहिए कि वह बहुत दिन तक रहेगा। न दुख शाश्वत है न सुख। यह जीवन का चक्र है। यह सब लगा रहेगा।
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