विश्व प्रसिद्ध तबला वादक ज़ाकिर हुसैन का आज जन्मदिन है। 9 मार्च 1951 को मुंबई में पैदा हुए ज़ाकिर हुसैन ने मात्र 12 साल की उम्र से ही संगीत की दुनिया में अपने तबले की आवाज़ को बिखेरना शुरू कर दिया था।
1973 में उनका पहला एलबम लिविंग इन द मैटेरियल वर्ल्ड आया था। उसके बाद तो जैसे ज़ाकिर हुसैन ने ठान लिया कि वो अपने तबले की आवाज़ से समूचे विश्व को परिचित कराएंगे। 1973 से लेकर 2007 तक ज़ाकिर हुसैन विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय समारोहों और एलबमों में अपने तबले का दम दिखाते रहे। ज़ाकिर हुसैन भारत में तो बहुत ही प्रसिद्ध हैं, साथ ही साथ ही विश्व के विभिन्न हिस्सों में भी समान रूप से लोकप्रिय हैं।
तबला वादक उस्ताद ‘अल्ला रक्खा’ के बेटे ज़ाकिर हुसैन को 2 ‘ग्रैमी अवार्ड’ मिल चुके हैं। इसके अलावा वो पद्म श्री, पद्म भूषण और ‘संगीत नाटक अकादमी’ सम्मान से भी नवाज़े गए हैं।
‘वाह उस्ताद, वाह’…. हर जुबान पर जमाने से कायम ये खुशी के लफ्ज भी ज़ाकिर हुसैन के हैं।
ज़ाकिर हुसैन कहते हैं कि ‘मुझे आज भी याद हैं बचपन के वे दिन, जब वह अब्बा के साथ खूबसूरत घरेलू महफ़िलों में जाया करते थे। जब तक अब्बा लोगों के साथ खा-पी रहे होते, म्युज़ीशियन उनका रसोई में इंतज़ार करते। बुलाए जाने पर ही वह बाहर आते। वह अब्बा के साथ डब्बे भर-भर के खाना घर लाया करते थे। अब्बा हमेशा कहते थे कि ये तबला तो सरस्वती की तरह पूजनीय है। इसकी इज्जत किया करो। इसे रास्ते की चीज मत समझो। कभी तबले के पास जूता न रखो। तबले पर कभी अपने कपड़े न रखो। उसको एक पूजा की चीज समझो। हर वाद्य में एक रूह है। एक आत्मा है। अगर तुमको एक अच्छा कलाकार बनना है तो उस वाद्य से इजाजत लेनी पड़ेगी कि वह वाद्य उसको कुबूल कर ले। ये बहुत जरूरी चीज है। अगर उस वाद्य ने स्वीकार कर लिया तो समझो कि दरवाजा खुल गया। जैसे उस्ताद विलायत खान साहब थे तो सितार जैसे उनसे पूछता कि आप हुक्म करिए कि मुझे करना है। तभी उनके दिमाग में जो आता, वह उस पर गूंजने लग जाता।’ जाकिर हुसैन बताते हैं कि ‘ऐसा तब होता है, जब साज कलाकार से सहमत होता है, जैसा वह बजाना चाहता है, अपने आप बजने लगता है। यह तब होता है, जब कलाकार का साज से विशेष रिश्ता बन जाता है। रिश्ता उसकी रूह से बनता है। मैं जब बारह साल का था, तब से मैंने तबला वादन का सफर शुरू किया। कितना कठिन वक्त था वह। मुंबई से जा रहा हूं। पटना या कोलकाता जा रहा हूं। मुगलसराय में उतरकर ट्रेन बदल रहा हूं। छोटा सा था। तब मेरे पास इतने पैसे नहीं होते कि आरक्षित कोच से यात्रा कर पाऊं। बस यही होता कि किसी भी तरह ट्रेन में लद जाना है। उस वक्त भी अब्बा की बातें पलभर को भी नहीं भूल पाता था कि हुक्म है, ये तबला भर नहीं, सरस्वती हैं। लाख भीड़भाड़ में भी तबले को किसी ठेस नहीं लगनी चाहिए।
-एजेंसियां
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