प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार खुशवंत सिंह की आज पुण्यतिथि है। 02 फरवरी 1915 को अखंड भारत के पंजाब में जन्मे खुशवंत सिंह की मृत्यु 20 मार्च 2014 के दिन दिल्ली में हुई।
एक ऐसा लेखक जो अपनी सोच में अलग था, दिल की बात जुबां से जब भी निकलती, एक कहानी कह जाती जिसमें अलग सा कुछ होता था, सच को कहने का साहस और सलीका अगर किसी से सीखना हो तो खुशवंत सिंह से बेहतर कौन हो सकता है?
उनकी जिंदगी की किताब के हर पन्ने पर उम्र के लंबे अनुभवों, लोगों की मुलाकातों से ऐसी कहानियां निकलीं जिनके छपने पर विवाद भी हुआ और बातों को बयां करने के अंदाज की तारीफ भी।
‘खुशवंतनामा’ यू हीं नहीं बना करता, सालों लग जाते है, अपने आप को और जिंदगी को समझने में लेकिन लेखक खुशवंत सिंह औरों से अलग थे और जिंदगी के अपने खास अनुभवों के बारे में लिखते हुए अपनी किताब में। तभी तो उन्होंने कहा था कि ‘मैं इस दु:खद नतीजे पर पहुंचा हूं कि मैं कुछ कामुक किस्म का इंसान रहा हूं। चार साल की उम्र से लेकर जीवन के 99 साल पूरे करने के बाद भी कामुकता ही मेरे दिमाग में ऊपर रही है।“ दरअसल खुशवंत सिंह ऐसे ही थे साफ दिल, और उनके दिल में महिलापात्र हमेशा खोज का विषय रही है। अपनी इसी स्पष्ट सोच के चलते खुशवंत सिंह भारतीय आदर्श को कबूल करने में पूरी तरह से अपने आप को फिट नहीं पाते थे।
खुशवंतनामा में है खुशवंत सिंह का कुबूलनामा
खुशवंतनामा में उन्होंने अपने बचपन में पंछियों के शिकार की बात लिखते हुए कहा है कि यह उनका एक ऐसा अपराध था जिसकी कोई माफी नहीं थी,और उनको अपनी इन बातों के लिए बेहद अफसोस होता है।
वे लिखते हैं ‘एयरगन से मैनें दर्जनों गोरैयाओं का मार दिया था जबकि उन्होंने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा था। मैने एक बत्तख को तब गोली मार दी थी जब वह अपने अंडो के उपर बैठा हुआ था,वह उपर की तरफ उड़ा और तब तक पंख फड़फड़ाता रहा जब तक की नीचे नहीं गिर गया।‘ खुशवंत सिंह ने अपने बचपन के दिनों में कई निदोर्ष पंछियों के मारे जाने को अपने लिए किसी सजा से कम नहीं मानते थे,उनका कहना था कि मैं अपने कर्मो की कीमत चुका रहा हूं,शाम दर शाम उन निर्दोष जंतुओं की यादें मेरा पीछा करती है। वो खुशवंतनामा में इस बात को भी स्वीकार करते है कि बचपन के उन दिनों में कोई ऐसा नहीं था जिसने आगर उनको ऐसा करने से रोका हो और इसे गलत कहा हो,वो स्वीकार करते है कि यह ऐसा पाप था जिसकी कोई माफी नहीं थी।
अस्सी से अधिक किताबें लिखीं खुशवंत सिंह ने
खुशवंत सिंह का बचपन और उनके युवा मन की सोच के आगे भी एक जहां बनता है जिसने जिंदगी के 98 बसंत देखे जिसमें उनके नाम अस्सी से अधिक किताबें हैं। जिसमें उपन्यास,कहानियों की किताबें,जीवनियां,लेख आदि शामिल है।
दरअसल, खुशवंत सिंह ने जिंदगी के हर रंग को देखा, और दिल की किताब में रखे शब्दों से इबारत बना कतरा कतरा शब्दो को चुनकर अपने समय का सच बयां कर गए। जिंदगी की शाम जी हां जिसे बुढ़ापा कहते है,जिसका नाम सुनकर लोग डर जाते है,उसे भी खुशवंत सिंह ने बहुत शानदार अंदाज में जिया,संगीत सुनना और स्वादिष्ठ भोजन का स्वाद लेना उनको बेहद पसंद था। वे लोगों से कम मिलना चाहते थे लेकिन कोई आ भी जाता तो उसे मना नहीं करते।
खुशवंतनामा में वे लिखते हैं, ‘जब किसी की उम्र हो जाती है तो उसकी पांच ज्ञानेन्द्रियों में से चार समय के साथ जवाब दे जाती है,केवल एक भोजन का स्वाद बाकियों से अधिक दिन तक रहता है।‘ खुशवंत सिंह मानते थे कि भोजन का आनंद सबसे अधिक खामोशी के साथ खाने में आता है। हालांकि उनका मत था कि परिवार के सदस्यों के साथ साथ खाने में दोस्ती को गहरा बनाने और परिवार को साथ रखने में मदद मिलती है। आज बेशक खुशवंत सिंह हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी जिंदगी के अनमोल पलों से निकालकर उन्होंने जो किताबें लिखी है वह हमारे साथ हमेशा रहेगी जो बताएगी जिंदगी क्या है और इसे कैसे जीना चाहिए।
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