केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू के कश्मीर पर लिखे गए लेख को लेकर पिछले दिनों काफी विवाद हुआ। किरेन रिजिजू का कहना है कि कश्मीर पर उनका लेख मेरे अपने शब्द नहीं हैं, वे पंडित जवाहर लाल नेहरू के संसदीय रिकॉर्ड और उस समय से सभी सरकारी आदान-प्रदान हैं। उन्होंने कहा, ‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि 70 से अधिक वर्षों तक जम्मू-कश्मीर की सच्चाई को दबाया और छुपाया गया। मैं इसे लोगों के सामने लाया, क्योंकि हम इतिहास नहीं बदल सकते।’
कश्मीर के लोगों ने बहुत उत्पीड़न का सामना किया
किरेन रिजिजू ने कहा, ‘इतिहास को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए न कि किसी की राय से प्रभावित होकर। इसलिए मैंने कश्मीर के इतिहास को उठाया, जो दबा दिया गया था। कश्मीर के लोगों ने बहुत उत्पीड़न और कठिनाई का सामना किया है। अब समय आ गया है कि इसे दुरुस्त किया जाए, उन्हें प्यार चाहिए।
अदालतों को मजबूत करना सरकार का कर्तव्य
किरेन रिजिजू गुरुवार को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग दौरे पर थे। इस दौरान केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कोई भी अपराध, उसके पीछे अपराधी कोई भी हो, कानून को उससे सख्ती से निपटना चाहिए। इसके लिए कोर्ट है, वो कार्रवाई करेगी। अदालतों को मजबूत करना सरकार का कर्तव्य है। सभी अदालतें एकजुट हैं और वे चाहते हैं कि देश का कानून का राज मजबूत हो।
गौरतलब है कि किरेन रिजिजू ने अपने एक लेख में दावा किया है कि जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह 15 अगस्त, 1947 से पहले भी भारत में शामिल होना चाहते थे। हालांकि, ऐसा करने से नेहरू ने इंकार कर दिया था। नेहरू एक व्यक्तिगत एजेंडे से प्रेरित थे और उन्होंने कश्मीर में एक शून्य पैदा किया, जिसने पाकिस्तान को अपने मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति दी। कश्मीर पर नेहरू की कई गलतियां रिजिजू ने लेख में गिनवाई।
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