Mathura (Uttar Pradesh, India)। मथुरा। जिम्मेदार सरकारी विभागों ने कोरोना से निपटने का पाठ आम आदमी को जमकर पढाया है। इसका लाभ कान्हा की नगरी को खूब मिला है। आगरा और एनसीआर से सटा होने के बादवजूद मथुरा में कोरोना को लेकर उतनी नाजुक स्थिति कभी नहीं बनी जिनती कि आगरा और एनसीआर में रही है। लेकिन इस पूरी कवायद में वही सरकारी महकमे शिद्दत से कभी भी कोविड-19 की गाइड लाइन का पालन करते नजर नहीं आये। जिन्होंने आम जनता को कोरोना से बचने का पाठ पढाया है।
इस महीने में दो करोड से ज्यादा के चालान किये गये
यहां तक कि यातायात माह में बिना मास्क और बिना हेल्मेट के चालान किये गये, इसमें भी सरकारी और गैर सरकारी का भेद साफ दिखा। इस महीने में दो करोड से ज्यादा के चालान किये गये। कुछ वसूली हुई बाकी होनी वाकी है। रेंडम सैंपलिंग में भी जिम्मेदारों को अपनों की लापरवाही नजर नहीं आ रही है। जिन सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों से लोग प्रेरणा ले सकते हैं वही कोविड के नियम तोडने के लिए अपने व्यवहार से लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। कुछ नहीं होता और सब चलता है का पाढ भी सरकारी विभाग ही जनता को पढा रहे हैं।
किसी अधिकारी के पास देखने का समय नहीं है कि रोडवेज बस स्टैण्ड पर थर्मल स्क्रीनिंग हो रही है या नहीं
उत्तर प्रदेश परिवहन निगम ने कोविड-19 की गाइड लाइन की धज्जियां उडा कर रख दी हैं। जब मास्क लगाये सवारियां रोडवेज बस के चालक और परिचालक को ही बिना मास्क के देखती हैं तो इधर उधर देख कर अपना मास्क हटा लेती हैं। जब खुद चालक परिचालक और रोडवेज के अधिकारी तथा कर्मचारी ही मास्क नहीं लगा रहे हैं तो वह सवारियों को मास्क लगाने के लिए कहेंगे यह संभव नहीं है। बस में चढने से पहले हाथों को सेनेटाइज करने सामाजिक दूरी जैसे तमाम नियम कायदे तो बने लेकिन खुद विभाग ने ही लोगों को इनका पालन नहीं करने के लिए एक तरह से उकसाया है। किसी अधिकारी के पास यह जाकर देखने का समय नहीं है कि रोडवेज बस स्टैण्ड पर थर्मल स्क्रीनिंग हो रही है या नहीं, एनसीआर में कोरोना के बढते असर के बाद एनसीआर से आने वाली बसों के यात्रियों की तो कम से कम बस स्टैण्ड पर ही थर्मल स्क्रीनिंग हो जानी चाहिए थी लेकिन इसकी भी कहीं कोई व्यवस्था नहीं दिखी। सेनेटाइजेशन के लिए बनाया गया बूथ भी वीरान पडा है। ऐसा लगता है कि सरकारी अधिकारी और कर्मचारी जानते हैं कि कोरोना से किसे और कितना नुकसान है। इस लिए वह अपने हिसाब से काम रहे हैं। जबकि रोडवेज बस के चालक और परिचालक ही भीड को लेकर अधिकारियों पर आरोप लगा रहे हैं कि अधिकारी कहते है कि पैसे कमाओ इस पर हम क्या कर सकते हैं। जिस तरह जो कोविड हेल्प डेस्क है वो खाली पड़ी है और जो रजिस्टर यात्रिओं का ब्योरा लिखने का है उसमें एंट्री एक एक महीने बाद की है। जब एआरएम से जानने का प्रयास किया गया तो वह आफिस में नही मिले और फोन पर बात करने की कोशिश की तो लगातार व्यस्त जाता रहा।
रोडवेज ने जानबूझ कर दे दी कमाई के लिए ढिलाई
लॉकडाउन के बाद जब उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसों को सडकों पर उतारा गया तो वह लम्बे समय तक घाटे में चलती रहीं। अधिकारियों का दबाव इस घाटे से निकलने का था। इसके चलते जानबूझ कर कोविड के नियमों में ढिलाई बरती जाने लगी जिससे कि लोग प्राइवेट और डग्गेमार वाहनों की बजाय रोडवेज की बसों से सफर करें।
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