नई दिल्ली। सेना को जल्द ही ब्रिटिश काल की औपनिवेशिक विरासत और निशानियों से निजात मिलेगी। इसकी समीक्षा शुरु हो गई है। कोशिश हो रही है कि सेना का सही मायने में भारतीयकरण हो। इस साल बीटिंग रिट्रीट में बजी धुन ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ से अब अंग्रेजी धुन ‘अबाइड विद मी’ की विदाई हो गई। फिर नौसेना के झंडे का निशान बदला। अब और भी काफी कुछ बदलने की तैयारी है, ताकि भारतीय सेना ब्रिटिश काल की निशानियों से मुक्त हो और अपने तौर-तरीक़ों और परंपराओं में भी पूरी तरह भारतीय दिखे।
इस पर सेना मुख्यालय और रक्षा विभाग के आला अधिकारियों के साथ बैठक भी हो रही है। पुराने नियमों और नीतियों की समीक्षा हो रही है। ब्रिटिश काल के नाम और तरीक़े भी बदलेंगे। यूनिट और रेजिमेंट के नाम भी बदल सकते हैं। सेना की वर्दी और कंधे पर लगने वाले सितारों की भी समीक्षा होगी। अंतिम संस्कार में तोप बग्घी के इस्तेमाल पर भी विचार होगा।
दरअसल सेना में आजादी के दौर के पहले के रीति-रिवाज चले आ रहे हैं। मेस में खाने से लेकर बीटिंग रिट्रीट जैसे समारोह तक, लेकिन अब सेना का भारतीयकरण होना है। हालांकि इस बदलाव की अपनी चुनौतियां हैं।
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