देश की राजनीति आजकल नकारात्मक मुद्दों पर केंद्रित होती जा रही है। लगभग सभी दलों के नेताओं के ऐसे बयान सामने आते हैं, जिनसे अनावश्यक विवाद खड़ा हो जाता है और राजनीति गरमा जाती है। राणा सांगा जैसे ऐतिहासिक और वीर पुरुष पर किसी सिरफिरे द्वारा दिया गया दुर्भाग्यपूर्ण बयान उनकी महानता या वीरता को कम नहीं कर सकता। जनाक्रोश स्वाभाविक है, परंतु सत्ताधारी दल द्वारा इसे अनावश्यक तूल नहीं देना चाहिए।
कुछ सिरफिरे बोलते रहते हैं। कुछ बातों को यूं ही “पासिंग रेफरेंस” में छोड़ देना समझदारी होती है। चुक चुके कुछ लोग जातीय ध्रुवीकरण के लिए या राजनीति में पुनर्जीवित होने की कोशिश में ऐसे बयान देते हैं। इस स्थिति में विवेक यही है कि उन्हें अनावश्यक महत्व न दिया जाए। अन्यथा कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है और दोष सरकार पर आता है।
राजपूत आंदोलन को यदि रोका जाता है या कुचला जाता है तो राजपूत समुदाय की नाराजगी बढ़ती है। जैसा कि पिछले चुनावों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में देखा गया। वहीं यदि आंदोलन को और बढ़ने दिया जाता है, तो मामला जातीय संघर्ष की ओर मुड़ सकता है। फिर यह कहा जाएगा कि दलितों की आवाज़ दबाई जा रही है, और पुराना ठाकुर-जाटव संघर्ष फिर से सिर उठाने लगेगा।
इसलिए राजनीतिक समझदारी यह है कि शक्ति अवश्य दिखाई जाए, लेकिन उसकी एक सीमा होनी चाहिए। भाजपा ने राज्यसभा में इस मुद्दे पर बात की है, संबंधित व्यक्ति की विवादित बातों को कार्यवाही से हटाया भी किया जा चुका है, और खेद भी प्रकट किया गया है। अब इसे यहीं विराम दिया जाना चाहिए, और आगे अनावश्यक तूल देकर स्थिति को और न बिगाड़ा जाए।
-पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक
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