नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति उनके दायित्वों का निर्वहन कर सकते हैं, तो राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) की गैर-मौजूदगी में उपसभापति उनके कार्य क्यों नहीं कर सकते। यह टिप्पणी जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस सी शर्मा की पीठ ने की।
उपसभापति की भूमिका पर दलील से असहमति
पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा की ओर से पेश उस दलील से असहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि राज्यसभा के उपसभापति के पास किसी प्रस्ताव के नोटिस को खारिज करने का अधिकार नहीं है। दलील में यह भी कहा गया कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को ही किसी न्यायाधीश के खिलाफ प्रस्ताव के नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है।
जस्टिस वर्मा से जुड़ा मामला
गौरतलब है कि जस्टिस वर्मा के नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर पिछले वर्ष 14 मार्च को अधजले नोटों की गड्डियां मिलने के बाद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में वापस भेज दिया गया था। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही संसदीय समिति की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल फैसला सुरक्षित रख लिया है और सभी पक्षों को सोमवार तक लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है।
वरिष्ठ वकीलों की दलील
न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 91, जो राज्यसभा के उपसभापति को सभापति की अनुपस्थिति में उनके कर्तव्यों का निर्वहन करने की अनुमति देता है, न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत सभापति को प्राप्त विशेष विवेकाधीन शक्तियों के प्रयोग का आधार नहीं बन सकता।
लूथरा ने कहा कि नए सभापति की नियुक्ति तक इस मामले को टाला जा सकता था। उन्होंने बताया कि तत्कालीन उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद उपसभापति हरिवंश ने न्यायाधीश को पद से हटाने के प्रस्ताव के नोटिस को खारिज कर दिया था। रोहतगी ने तर्क दिया कि यह अधिकार केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को है।
पीठ का कड़ा सवाल
इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी आदेशों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, तो सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति न्यायाधीश को हटाने से जुड़े प्रस्ताव के नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार क्यों नहीं कर सकते। जस्टिस दत्ता ने कहा, “देश को आगे बढ़ना होगा।”
अधिनियम की व्याख्या पर बहस
रोहतगी ने दोहराया कि उपसभापति केवल सभापति के सामान्य कर्तव्यों का निर्वहन कर सकते हैं, जबकि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम में स्पष्ट रूप से केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति का उल्लेख है। इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा कि अधिनियम की परिभाषा संबंधी धाराओं में भी “जब तक संदर्भ अन्यथा अपेक्षित न हो” जैसी अभिव्यक्ति का प्रयोग किया गया है।
सरकार की ओर से दलील
संसद के दोनों सदनों की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि यदि उपसभापति सभापति की शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता, तो पूरी प्रक्रिया अव्यवहार्य हो जाएगी। उन्होंने कहा कि जांच समिति को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होती है।
पहले भी दे चुका है अदालत संकेत
शीर्ष अदालत ने इससे पहले बुधवार को कहा था कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित समिति पर कोई रोक नहीं है।
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