लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर ‘हाथी’ अपनी चाल बदलने की तैयारी में है। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती इन दिनों अपने पुराने और सबसे सफल ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के फॉर्मूले को धार दे रही हैं। दलित-मुस्लिम गठजोड़ के विफल होने के बाद, मायावती की नजरें अब एक बार फिर उत्तर प्रदेश के प्रभावशाली ब्राह्मण वोट बैंक पर टिकी हैं। सवाल बड़ा है: क्या 2027 में ‘हाथी’ का कमबैक 2007 की तर्ज पर होगा?
ब्राह्मणों के प्रति अचानक बढ़ा ‘अनुराग’
पिछले कुछ महीनों में मायावती के बयानों का केंद्र बिंदु ब्राह्मण समाज रहा है। चाहे वह यूजीसी (UGC) इक्विटी नियमों पर सवर्णों के हितों की बात हो, या फिर हालिया विवादित वेब सीरीज ‘घूसखोर पंडत’ पर प्रतिबंध लगाने की मांग। मायावती अब ‘तिलक, तराजू और तलवार’ के पुराने नारों से कोसों दूर, ब्राह्मणों के ‘सम्मान’ की सबसे बड़ी पैरोकार बनकर उभर रही हैं।
बाटी-चोखा नहीं, सम्मान चाहिए: मायावती का नया मंत्र
मायावती ने अपने जन्मदिन (15 जनवरी) के अवसर पर स्पष्ट संदेश दिया था कि ब्राह्मणों को केवल लुभावने आयोजनों (बाटी-चोखा) की नहीं, बल्कि सत्ता में वास्तविक ‘सम्मान’ और ‘हिस्सेदारी’ की जरूरत है। उन्होंने याद दिलाया कि 2007 से 2012 के बीच बसपा सरकार में ब्राह्मणों को जो प्रतिनिधित्व मिला, वह किसी अन्य सरकार में संभव नहीं हुआ।
फ्लैशबैक 2007: जब ‘सोशल इंजीनियरिंग’ ने रचा था इतिहास
साल 2007 यूपी की राजनीति के लिए टर्निंग पॉइंट था। मायावती ने ‘ब्राह्मण भाईचारा कमेटियों’ का गठन किया और सतीश चंद्र मिश्रा को इसका चेहरा बनाया। परिणाम स्वरूप बसपा ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।पहली बार ‘बहुजन’ से ‘सर्वजन’ का सफर तय हुआ। ब्राह्मणों ने एकजुट होकर बसपा को वोट दिया, जिससे पार्टी को सवर्णों का भी साथ मिला।
मुस्लिम मोहभंग और सवर्णों की ओर वापसी
पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों पर बड़ा दांव खेला था, लेकिन नतीजे सिफर रहे। मायावती का मानना है कि मुस्लिम वोट बैंक अब सपा और कांग्रेस की ओर शिफ्ट हो चुका है। ऐसे में, उन्होंने रणनीति बदलते हुए सवर्णों (विशेषकर ब्राह्मणों) को केंद्र में रखा है। उनका तर्क है कि सवर्णों ने ही उन्हें चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाने में मदद की है।
चुनौतियां और वर्तमान स्थिति
मायावती के लिए 2027 की राह आसान नहीं है। वर्तमान में बसपा का वर्चस्व अपने न्यूनतम स्तर पर है । विधानसभा में मात्र 1 विधायक (उमाशंकर सिंह) हैं। लोकसभा में पार्टी का शून्य सदस्य ही है । राज्यसभा में मात्र 1 सांसद है। संगठन की बात करें तो ग्राउंड लेवल पर कैडर को दोबारा सक्रिय करने की बड़ी चुनौती है ।
विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी के मजबूत सवर्ण आधार और सपा के बढ़ते ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के बीच बसपा के लिए जगह बनाना चुनौतीपूर्ण होगा। हालांकि, अगर मायावती ब्राह्मणों को यह समझाने में सफल रहीं कि बीजेपी में उनकी अनदेखी हो रही है, तो 2027 में ‘हाथी’ की चिंघाड़ फिर से सुनाई दे सकती है।
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