नई दिल्ली। नई यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर देशभर में जनरल कैटेगरी के छात्रों का विरोध अब सिर्फ शैक्षणिक दायरे तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुद्दा तेजी से एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विवाद का रूप ले चुका है। कैंपस से लेकर सड़कों तक चल रहे प्रदर्शन जिस स्तर का समर्थन हासिल कर रहे हैं, उसने केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। यही वजह है कि यह मामला अब मोदी सरकार के लिए एक गंभीर राजनीतिक चुनौती बनता नजर आ रहा है।
जनरल कैटेगरी के छात्रों का आरोप है कि नई गाइडलाइंस अवसरों की समानता के सिद्धांत को कमजोर करती हैं। छात्रों का कहना है कि पहले से ही प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में प्रवेश को लेकर दबाव है और ऐसे में ये नियम असंतुलन को और गहरा करेंगे। सवर्ण छात्रों की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि गाइडलाइंस में उन्हें परोक्ष रूप से जातिगत भेदभाव का दोषी मान लिया गया है, जबकि अगर उनके साथ भेदभाव होता है तो उसके लिए कोई प्रभावी शिकायत व्यवस्था नहीं दी गई है।
कलराज मिश्र का खुला विरोध
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र ने यूजीसी की नई गाइडलाइंस को असंवैधानिक बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे नियम नहीं होने चाहिए, जो सामान्य वर्ग में असमानता की भावना पैदा करें। कलराज मिश्र ने यह भी कहा कि शिकायत का अधिकार सभी के लिए समान होना चाहिए और झूठी शिकायतों के खिलाफ सख्त दंड का प्रावधान भी जरूरी है, जो मौजूदा नियमों में नहीं है।
कुमार विश्वास ने कविता से साधा निशाना
प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास ने भी यूजीसी गाइडलाइंस के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दिवंगत कवि रमेश रंजन मिश्र की कविता साझा करते हुए #UGC_RollBack हैशटैग लगाया। उनकी इस पोस्ट को गाइडलाइंस के विरोध में एक सांस्कृतिक और भावनात्मक समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।
मनोज मुंतशिर का तीखा बयान
गीतकार और कवि मनोज मुंतशिर ने यूजीसी बिल को “काला कानून” बताते हुए प्रधानमंत्री से इसे वापस लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि किसी एक वर्ग को खुश करने के लिए दूसरे वर्ग के अधिकारों को कमजोर करना देशहित में नहीं है। उनका कहना था कि अगर जातियों की राजनीति आगे बढ़ी तो इसका नुकसान पूरे देश को होगा।
भाजपा के भीतर बढ़ती असहजता
इन बयानों के बाद कई राज्यों में भाजपा के विधायक और पदाधिकारी भी खुलकर यूजीसी गाइडलाइंस के विरोध में सामने आने लगे हैं। कुछ जगहों पर पार्टी पदाधिकारियों के इस्तीफे की खबरों ने नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। इससे साफ है कि असंतोष अब सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के भीतर भी दरारें दिखने लगी हैं।
विपक्ष की रणनीतिक चुप्पी, मायावती का समर्थन
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस समेत अधिकतर विपक्षी दल इस मुद्दे पर खामोशी साधे हुए हैं। माना जा रहा है कि विपक्ष इसे भाजपा की आंतरिक उलझन मानकर दूरी बनाए हुए है। हालांकि बसपा प्रमुख मायावती ने यूजीसी गाइडलाइंस का समर्थन करते हुए इसे सामाजिक न्याय की दिशा में जरूरी कदम बताया है। इससे बहस और तीखी हो गई है।
मोदी सरकार के लिए क्यों चुनौती बना मुद्दा
यह मुद्दा मोदी सरकार के लिए इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि आंदोलन की अगुवाई छात्र कर रहे हैं, जो भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करते हैं। भाजपा के भीतर से उठ रही असहज आवाजें और विपक्ष की चुप्पी सरकार को अकेला कर रही हैं। यदि सरकार ने समय रहते संवाद और संशोधन का रास्ता नहीं अपनाया, तो यह विवाद शिक्षा नीति से आगे बढ़कर बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है। फिलहाल यूजीसी गाइडलाइंस न केवल कैंपस में, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी बेचैनी बढ़ा चुकी हैं।
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