गुड़गांव आर्थिक शहर है। उत्तर भारत का बिजनेस हब हैं। इसमें दुनियां भर की मल्टीनेशनल कंपनियों के ऑफिस हैं। इस शहर में अंतर राज्य वाली दिल्ली मेट्रो है, शहर के अंदर के लिए लोकल मेट्रो है, हाइवे है गगनचुंबी ऑफिस हैं। गुड़गांव हरियाणा में सबसे ज्यादा राजस्व कमाने वाला शहर है।
यहां कुछ एरिया में फ्लैट्स की कीमत मुंबई से भी महंगी है, बल्कि दुनियां में सबसे महंगा रियल एस्टेट यहां है। यहां एक फ्लैट की कीमत 100 करोड़ से भी ऊपर जाती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फ्लैग कंपनी का “ट्रंप टावर” भी यही लॉन्च हुआ और सारा का सारा 24 घंटे में बिक गया।
लेकिन गुड़गांव की सड़कों पे घंटों का जाम लगता है। जरा सी बारिश हो जाए तो सड़कें डूब जाती हैं। सैकड़ों करोड़ वाले फ्लैट की सोसाइटी के बेसमेंट में पानी घुस जाता है। आवागमन ठप्प, हो जाता है।
इसका कारण है शहर में पानी की निकासी की घटिया प्लानिंग। सीवेज सिस्टम, नालियां, गटर सिस्टम तो जैसे है ही नहीं।
किसी भी एरिया को बसाने से पहले वहां सड़कें और जल निकासी की स्थाई व्यवस्था की जाती हैं। भूमि के ढाल के अनुसार नालियां बनानी होती है वो नहीं बनाई। जब सोसाइटी नीची जमीन पर बनी हैं और उससे निकलने वाली नाली जिस गटर में गिरती है वो एरिया ऊंचा है तो पानी का निकास होगा कैसे ?
अथॉरिटी जब प्लॉटिंग करती है तो डेवलेपमेंट चार्ज लेती है। वो चार्ज इन्हीं सब चीजों का होता है। जब आपने ये सब डेवलेपमेंट नहीं किया तो पब्लिक से वसूल किया पैसा आखिर गया कहां ?
जब दिल्ली का ओखला इंडस्ट्रियल एरिया आगे बढ़ा तो एक ऑथोरिटी बनी New Okhla Industrial Authority जिसे आप आज NOIDA के नाम से जानते हैं। नोएडा आगे बढ़ा तो Greater Noida बना। इसके बाद भविष्य को ध्यान में रखते हुए यमुना एक्सप्रेसवे बना। इन सबकी अपनी ऑटोनॉमस अथॉरिटी हैं। यहां की ऑथोरिटी द्वारा जो भी राजस्व कमाया जाता है वो यही के विकास में लगाया जाता है। इस लिए कितनी भी बारिश हों जाए ये शहर तैयार हैं। जलभराव होता है लेकिन एक घंटे में शहर वापस दौड़ने लगता है।
गुड़गांव की वो अथॉरिटी कहां है ?
इसका सबसे ज्यादा दोष जाता है यहां की अथॉरिटी और यहां बनीं सरकारों को। सबसे कमाऊ शहर की अपनी कोई स्पेसिफिक अथॉरिटी नहीं है। एक ही हुड्डा ऑथोरिटी सब शहरों को मैनेज करती है। गुड़गांव का पैसा पलवल में, फरीदाबाद का पैसा रोहतक में लगता है। जब एक जगह की पब्लिक हिसाब मांगती है तो दूसरे शहर का नाम लेके जवाबदेही से बचा जाता है।
हरियाणा राज्य सरकार को उत्तर प्रदेश के (मायावती और अखिलेश यादव) नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना मॉडल से सीखना चाहिए। नोएडा का कमाया पैसा लखनऊ में नहीं लगता। ग्रेटर नोएडा का यमुना में नहीं लगता। इस लिए ये अथॉरिटीज प्लाटिंग निकालने से पहले ही वहां नाली, गटर, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट और बिजली की सुविधा लगा देती है। ये सब कैश सरप्लस अथॉरिटी हैं जबकि इनके यहां गुड़गांव का चौथाई बिजनेस भी नहीं है।
ऐसा नहीं है कि समस्याओं के समाधान नहीं है। नियत नहीं है सुधार करने की। क्योंकि एक बार पूर्ण सुधार कर दिया तो हर साल करोड़ों का बजट कैसे बनेगा। यमुना एक्सप्रेसवे पर एयरपोर्ट बनते ही ये तीन शहर मिलके गुड़गांव का 80% धंधा खींच लेंगे। हरियाणा को राजस्व का बहुत तगड़ा नुकसान होने वाला हैं। वहां के रियल एस्टेट रेट भी बुरी तरह गिरेंगे। आने वाला समय यूपी पश्चिम का है।
साभार सहित -लक्ष्मी प्रताप सिंह
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