आज की तारीख में, जब हम और आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की जद्दोजहद में मसरूफ हैं, दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले ने भारतीय न्याय व्यवस्था, राजनीतिक रसूख और एक पीड़िता के अंतहीन डर के बीच के रिश्तों को एक बार फिर नंगा कर दिया है। कल अखबारों के पन्नों पर यह खबर एक सामान्य अदालती कार्यवाही की तरह छपी होगी —”उन्नाव बलात्कार मामले में कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित” लेकिन क्या यह खबर इतनी ही सीधी है? क्या शब्दों के इस चयन के पीछे छिपी उस खौफनाक दास्तान को हम भूल गए हैं, जिसने 2017 से लेकर आज तक एक परिवार को धीरे-धीरे खत्म कर दिया?
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2017 के उन्नाव बलात्कार मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा को निलंबित करते हुए उन्हें अंतरिम जमानत दी है । अदालत ने रिहाई की शर्त के तौर पर एक अजीबोगरीब पैमाना तय किया है ” बलात्कारी सेंगर पीड़िता के निवास स्थान से पांच किलोमीटर के दायरे में प्रवेश नहीं करेगा।
पांच किलोमीटर यह दूरी नापने में बहुत छोटी लग सकती है। एक तेज रफ्तार गाड़ी के लिए यह महज कुछ मिनटों का फासला है। लेकिन उस पीड़िता के लिए, जिसने अपने पिता को पुलिस हिरासत में मरते देखा हो, जिसने अपनी चाचियों को एक ट्रक एक्सीडेंट में अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते देखा हो, और जो खुद मौत के मुंह से बाहर निकलकर आई हो, क्या यह पांच किलोमीटर की अदृश्य लकीर वाकई सुरक्षा की गारंटी बन सकती है? क्या डर का कोई भूगोल होता है? क्या खौफ को फीते से नापा जा सकता है?
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