आगरा। ताजनगरी के शाहदरा बगीची इलाके में पशु-मानव प्रेम की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को नया अर्थ दिया है। घनश्याम दीक्षित के परिवार ने अपने पालतू लेब्राडोर ‘टाइगर’ के निधन पर उसे किसी जानवर की तरह नहीं, बल्कि घर के बड़े बेटे की तरह हिंदू रीति-रिवाजों के साथ अंतिम विदाई दी।
मोहल्ले का ‘तिलकधारी’ अब यादों में
टाइगर पिछले 14 वर्षों से दीक्षित परिवार का अभिन्न हिस्सा था। परिवार उसे केवल एक कुत्ता नहीं बल्कि घर का रक्षक और बेटा मानता था। घर में होने वाले हर धार्मिक अनुष्ठान में टाइगर के माथे पर भी तिलक लगाया जाता था, जिसके चलते पूरे मोहल्ले में वह ‘तिलकधारी’ के नाम से मशहूर था। बीमारी के चलते उपचार के दौरान टाइगर ने अंतिम सांस ली, तो परिवार के साथ-साथ पूरा इलाका गमगीन हो गया।
गंगा घाट पर अंतिम संस्कार और तेरहवीं की रस्में
दीक्षित परिवार ने टाइगर के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम दिखाते हुए राजघाट पर उसका अंतिम संस्कार किया। इतना ही नहीं, परिवार के सदस्यों ने शोक प्रकट करते हुए मुंडन संस्कार भी कराया। 13 दिनों के शोक के बाद, उसकी आत्मा की शांति के लिए बाकायदा हवन, तेरहवीं और ब्रह्मभोज का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में मोहल्ले वासियों ने शामिल होकर उसे श्रद्धांजलि दी।
प्रेम रिश्तों का मोहताज नहीं
परिजनों का कहना है कि टाइगर ने 14 सालों तक निस्वार्थ भाव से परिवार का साथ निभाया। मोहल्ले के लोगों के अनुसार, दीक्षित परिवार की यह पहल समाज में पशुओं के प्रति क्रूरता के इस दौर में करुणा और जिम्मेदारी का एक बड़ा संदेश है।
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