नई दिल्ली। बसंत पंचमी का पर्व ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित माना जाता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हर साल यह त्योहार श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस बार बसंत पंचमी की शुभ तिथि आज है। खास बात यह है कि बसंत पंचमी का उत्सव केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिल्ली में यह पर्व गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत मिसाल बनकर सामने आता है।
बसंत पंचमी के मौके पर हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह में भी खास आयोजन होता है, जिसे ‘सूफी बसंत’ कहा जाता है। इस दिन दरगाह परिसर पीले रंग की चादरों, फूलों और कपड़ों से सराबोर नजर आता है। यहां हर धर्म के लोग पीले वस्त्र पहनकर आते हैं और दरगाह पर पीली चादर चढ़ाते हैं।
800 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम
कहा जाता है कि यह परंपरा करीब 800 साल पुरानी है। बसंत पंचमी के दिन दरगाह में जो उत्सव मनाया जाता है, वह मां सरस्वती की पूजा के लिए नहीं, बल्कि एक शिष्य द्वारा अपने गुरु को खुश करने की भावना से जुड़ा हुआ है।
जब शोक में थे हजरत निजामुद्दीन औलिया
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, 13वीं-14वीं शताब्दी के समय हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने प्रिय भतीजे के निधन के बाद गहरे शोक में चले गए थे। वे न किसी से बातचीत कर रहे थे और न ही भोजन कर पा रहे थे। उनके शिष्य अमीर खुसरो अपने गुरु की यह हालत देखकर परेशान थे और उन्हें खुश करने का उपाय खोज रहे थे।
इसी दौरान बसंत पंचमी के दिन अमीर खुसरो ने कुछ महिलाओं को पीले वस्त्र और पीले फूलों के साथ जाते देखा। पूछने पर महिलाओं ने बताया कि वे ये फूल देवी सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए ले जा रही हैं।
अमीर खुसरो ने ऐसे लौटाई गुरु के चेहरे पर मुस्कान
यह बात सुनकर अमीर खुसरो ने सोचा कि पीले फूल और बसंती रंग देखकर उनके गुरु का मन भी प्रसन्न हो सकता है। उन्होंने खुद पीली पोशाक पहनी, हाथ में सरसों के फूल लिए और गुरु के सामने पहुंचे। अमीर खुसरो को इस रूप में देखकर हजरत निजामुद्दीन औलिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसी दिन से दरगाह में हर साल बसंत पंचमी पर सूफी बसंत मनाने की परंपरा शुरू हुई।
हर धर्म के लोग बनते हैं सूफी बसंत का हिस्सा
सूफी बसंत की खासियत यह है कि इसमें केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सहित हर धर्म के लोग शामिल होते हैं। यही वजह है कि इसे भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत उदाहरण भी कहा जाता है।
अमीर खुसरो की रचना से गूंजता है माहौल
बसंत पंचमी पर दरगाह में अमीर खुसरो की प्रसिद्ध रचना भी याद की जाती है…
सकल बन फूल रही सरसों
बन बन फूल रही सरसों
अम्बवा फूटे टेसू फूले
कोयल बोले डार-डार
और गोरी करत सिंगार
मलनियाँ गढवा ले आईं कर सों
सकल बन फूल रही सरसों
तरह तरह के फूल खिलाए
ले गढवा हाथन में आए
निजामुद्दीन के दरवज्जे पर
आवन कह गए आशिक़ रंग
और बीत गए बरसों
सकल बन फूल रही सरसों
बसंती रंग, सूफी परंपरा और साझा संस्कृति के इस संगम के साथ दिल्ली में बसंत पंचमी का यह रूप हर साल लोगों को आपसी सौहार्द का संदेश देता है।
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