आगरा। शिक्षा के क्षेत्र में लगातार हो रहे बदलाव और किताबों की बढ़ती कीमतों ने अभिभावकों के लिए एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। आगरा में किताबों की दुकानों के बाहर और उसके अंदर की घटनाओं ने अभिभावकों को पूरी तरह से परेशान कर दिया है। किताब कारोबारियों की मनमानी और उनके द्वारा मनमाने दामों पर किताबों की बिक्री से अभिभावकों की जेब पर डाका डाला जा रहा है, जिससे न केवल उनका आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, बल्कि बच्चों की शिक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
हाल ही में एक बुक डिपो पर अभिभावकों के साथ अभद्रता की घटना ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया। अभिभावक किताबों की कीमतों को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त करने पहुंचे थे, लेकिन दुकानदारों ने न केवल उनकी बातों को नजरअंदाज किया, बल्कि उन्हें अपशब्दों से भी नवाजा यह घटना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई और आगरा के नागरिकों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी।
दुकानदारी की यह असंवेदनशीलता और अभिभावकों के साथ खराब व्यवहार ने शिक्षा के माहौल को गहरे धक्के दिए हैं।
सामाजिक संगठनों से बनाई आंदोलन की रणनीति
अब इस मुद्दे पर सामाजिक संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। श्री बकि बिहारी एजुकेशनल समिति के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन शर्मा ने इस संबंध में कहा, ‘इम इस पूरे मामले को लेकर आंदोलन की रणनीति तैयार कर रहे हैं। हम आगरा के सभी अभिभावकों और शिक्षकों को एकजुट करेंगे ताकि इस समस्या का समाधान निकाला जा सके। हम चाहते हैं कि प्रशासन किताब कारोचारियों पर सख्त कार्रवाई करे और शिक्षा के नाम पर होने वाली इस लूट को रोका जाए।’
डॉ. मदन मोहन शर्मा ने आगे कहा कि अगर प्रशासन जल्द ही कोई कदम नहीं उठाता, तो सामाजिक संगठन शहरभर में बड़े प्रदर्शन करेंगे। उनके मुताबिक, इस मामले में जागरूकता फैलाने और अभिभावकों की समस्याओं का समाधान खोजने के लिए वे अन्य संगठनों से भी संपर्क कर रहे हैं।
मनमाने दामों पर बेची जा रही हैं किताबें
आगरा में किताबों के दामों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिससे अभिभावक काफी परेशान हो गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में, खासकर नए सत्र के दौरान, किताबों को कीमतें आसमान छूने लगी हैं। एक तरफ जहां किताबों की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ दुकानदार अपनी मनमानी करते हुए किताबों के दाम बढ़ाते जा रहे हैं। इस वजह से अभिभावकों को अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जरूरतमंद किताबें खरीदने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
अधिकारी मौन
इस सबके बीच, स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग का मौन रवैया चिंताजनक है शिक्षकों, अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने कई बार इस मुद्दे पर अधिकारियों से कार्रवाई की अपील की, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ करते हुए वे किताब कारोबारी अपनी जेब भर रहे है, जबकि अभिभावक अपनी सीमित आय में बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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