International Mud day 29 June पर पढ़िए राजीव गुप्ता को आँखें खोल देने वाला आलेख
आज हम बात कर रहे मड डे (Mud day ) की, जो 29 जून को विश्व में मनाया जाता है। हम सब जानते हैं कि भारत में मिट्टी की क्या अहमियत है। यहाँ के लोग प्राचीन समय से मिट्टी में रह कर ही बड़े हुए हैं। आज भी उनके लिए मिट्टी की उपयोगिता किसी से नहीं छपी है। जो अंग्रेज हमें कल तक गंवार कहते थे, आज उन्होंने मड की उपयोगिता को मान लिया है। इसलिए वे कहते हैं कि अगर हम थोड़े गंदे हो जाएं तो क्या होगा। बहुत शोधों से पता चला है मड स्नान से एक निश्चित मात्रा में जीवाणुओं के संपर्क में आना हमारे लिए अच्छा है, क्योंकि यह प्रतिरक्षा का निर्माण करने में न केवल मदद करता है, बल्कि दिमाग़ी व शारीरिक स्वस्थ के लिए अच्छा है।
हम सब जानते हैं कि हमारे भारत में पहलवानी मिट्टी में होती है। कारण है मिट्टी शरीर को मज़बूत करती है। उसकी गंध दिमाग़ को ठंडा करती है। हमारे देश में मिट्टी का उपयोग विज्ञान चिकित्सा के क्षेत्र में सदियों से हो रहा है। कौन नहीं जानता कीचड़ यानी मिट्टी में खेली जाने वाली ब्रज की होली, बच्चों का मिट्टी और पानी से मनोरंजन करना, बरसात में तालाब व गड्ढे, मैदान आदि का भरना और उसमें खेलना, कोलाहल करना व तालाब की मिट्टी से मूर्ति व घर बनाना। इन सबके पीछे का विज्ञान व मस्ती हम सब जानते हैं। हमारे देश में दो दशक पहले आउट्डोर गेम ही थे, बिना धूल और गंदा होने की परवाह किये खेल जाते थे। इसीलिए आज भी भारत का इम्युनिटी सिस्टम के साथ दिमागी व शारीरिक स्वास्थ्य अन्य देशों से अच्छा है। इसलिए विदेशों में इस मिट्टी स्नान के लिए लोग मिट्टी स्नान और स्पा में स्नान के लिए सैकड़ों डालर का भुगतान करते हैं। वहां भारत जैसी भौगोलिक स्थिति नहीं है, इसलिए काफ़ी पैसा खर्च करके कहते हैं चलो निर्लज्ज हो जाएं। इस दिन गंदा होकर सबसे रचनात्मक और मजेदार गतिविधियों अंतर्राष्ट्रीय मड डे पर करते हैं। मिट्टी, गड्ढा और पानी का उपयोग कर हँसी और मस्ती करते हैं।
मड उत्सव भारत के लिए खास है जो गरीब को बिना पैसे के और अमीर को पैसे से विदेशियों की तरह मनोरंजन कराता है। इस दिन का आनंद लेने का एक और आसान तरीका है- घर में मिट्टी का गड्ढा बनाया जाए। उसमें पानी भर दें। यह न केवल यह सस्ता है, बल्कि आधुनिक समय में यह वास्तव में एक अनूठा अनुभव है। बुनियादी स्तर पर आप सभी की जरूरत है गंदगी, पानी और दोस्त। इसको फेसबुक व वॉट्सऐप के माध्यम से मनोरंजक खेल बनाना सकते हैं। फोटो प्रतियोगिता भी हो सकती है । एक बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए- मस्ती करते हुए तुम्हारे आँख, नाक, कान या मुँह में कीचड़ ना जाये। साथ ही खेलने के बाद साफ पानी व एंटीबायटिक साबुन से नहाना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय मड डे सबसे पहले वर्ष 2008 में नेपाल और ऑस्ट्रेलिया में विष्णु भट्ट और जिलियन मकओलिफ ने कीचड़ में बच्चों को खेलने के लिए इस तरह के त्योहार की शुरुआत की। औपचारिक रूप से 2011 में 29 जून को इंटरनेशनल मड डे के रूप में तय कर दिया गया। तब से इसे दुनियाभर में मनाया जाने लगा। अंतर्राष्ट्रीय मड डे की शुरुआत 2009 में एक वर्ल्ड फोरम ईवेंट में हुई थी, नेपाल में मड डे चावल उगाने वाले मौसम की शुरुआत का प्रतीक भी है। यह प्रकृति का उत्सव है जो चावल बोने के लिए आदर्श स्थान प्रदान करता है।
आज कोरोनावायरस के चलते हमें अपनी प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ाना पड़ेगा। लेकिन आज के आधुनिक समय में बच्चे घर के अंदर इंडोर गेम्स तक ही सीमित हो गए हैं। तमाम बच्चों को आउटडोर गेम्स के लिए प्रेरित करने और प्रकृति के करीब लाना होगा। आगरा शहर के लोग अगर मड डे की फ़ोटो भेजते हैं तो लोकस्वर उन्हें सम्मानित करने में गौरव महसूस करेगा।
प्रस्तुतिः राजीव गुप्ता
लोकस्वर, आगरा
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