अंबेडकरनगर: ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गौ-माता की रक्षा के लिए ‘धर्मयुद्ध यात्रा’ का शंखनाद करते हुए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और देश के राजनीतिक नेतृत्व पर तीखा प्रहार किया है। अंबेडकरनगर पहुंचे शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि अब संयम का समय समाप्त हो चुका है और गौ-माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए निर्णायक संघर्ष शुरू होगा।
योगी सरकार को दिया अल्टीमेटम हुआ खत्म
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम लेते हुए शंकराचार्य ने कहा, “हमने मुख्यमंत्री को 40 दिन का समय दिया था कि यदि कोई विसंगति है तो उसे सुधार लें। लेकिन उन 40 दिनों का उपयोग गौ-माता की रक्षा के लिए नहीं किया गया। यही कारण है कि अब हमें इस ‘धर्मयुद्ध’ के मैदान में उतरना पड़ा है।” उन्होंने दोटूक कहा कि चाहे नेता किसी भी दल का हो, उसे गौ-माता की रक्षा करनी ही होगी। यह हिंदुओं का देश है और हम अपनी माता को डॉलर के लालच में कटते हुए नहीं देख सकते।
’सरकारी’ बनाम ‘असरकारी’ संत
देश के साधु-संतों की भूमिका पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए अविमुक्तेश्वरानंद ने संतों को दो श्रेणियों में बांटा— ‘सरकारी’ और ‘असरकारी’। उन्होंने कहा, “हम खुद को असरकारी संतों की श्रेणी में रखते हैं। सरकारी संतों से सनातन धर्म का भला नहीं होने वाला। वे अन्याय और अत्याचार होते देख रहे हैं, फिर भी सत्ता के पक्ष में ही बोलते हैं।” उन्होंने आगाह किया कि यदि संत भी सरकार के स्वर में स्वर मिलाने लगेंगे, तो जनता का मार्गदर्शन कौन करेगा?
UGC संशोधन को बताया न्याय के विरुद्ध
गौ-रक्षा के साथ-साथ शंकराचार्य ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि हालिया संशोधनों के तहत कुछ वर्गों की शिकायत को सीधे सही मान लेना और आरोपी पर ही खुद को निर्दोष साबित करने का भार डालना न्याय के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है। इससे देश की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
शंकराचार्य के इस कड़े रुख और ‘सरकारी संतों’ पर की गई टिप्पणी ने धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
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