लखनऊ: खाड़ी देशों (Middle East) में जारी भीषण युद्ध की तपिश अब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चूल्हों तक पहुंच गई है। व्यावसायिक गैस सिलेंडरों (Commercial Cylinders) की आपूर्ति पर अचानक लगी रोक ने शहर की करीब 5 लाख की आबादी के सामने भोजन का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। इसका सबसे बुरा असर स्ट्रीट फूड वेंडरों, छोटे रेस्टोरेंट, ढाबा संचालकों और टिफिन सर्विस पर पड़ने वाला है।
छात्रों और कामगारों पर दोहरी मार
लखनऊ में बड़ी संख्या में छात्र, मजदूर और नौकरीपेशा लोग रहते हैं, जो अपने रोजाना के भोजन के लिए टिफिन सर्विस या ढाबों पर निर्भर हैं। अकेले लखनऊ विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के करीब 25 हजार से ज्यादा छात्र बाहर से आकर यहां रहते हैं। होटल और रेस्टोरेंट कारोबार से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि एक-दो दिन में आपूर्ति बहाल नहीं हुई, तो इन लोगों को भूखा रहने की नौबत आ सकती है।
विश्वविद्यालयों में अलर्ट: मेस में बचा है सीमित स्टॉक
लखनऊ विश्वविद्यालय (LU): विश्वविद्यालय के 18 छात्रावासों में करीब 2000 छात्र रहते हैं। चीफ प्रोवोस्ट प्रो. अनूप कुमार सिंह के मुताबिक, मेस में केवल 7 दिन का गैस रिजर्व बचा है। उन्होंने कहा कि युद्ध का इतना बड़ा असर होगा, इसकी उम्मीद नहीं थी।
BBAU और शकुंतला मिश्रा विवि: इन संस्थानों में फिलहाल 12 दिनों का बैकअप है, लेकिन युद्ध लंबा खिंचने पर यहां भी मेस संचालन ठप हो सकता है।
अन्य संस्थान: केंद्रीय संस्कृत विवि और अटल आवासीय विद्यालय में भी संकट के बादल हैं। संस्कृत विवि में रोजाना 10 सिलेंडरों की खपत है, लेकिन सोमवार को केवल 3 ही मिल पाए।
रोजी-रोटी पर भी संकट
व्यावसायिक गैस की कमी से न केवल खाने वालों को परेशानी होगी, बल्कि हजारों छोटे दुकानदारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। स्ट्रीट फूड वेंडरों के पास सिलेंडरों को स्टॉक करने की क्षमता कम होती है, जिससे उनकी दुकानें जल्द बंद हो सकती हैं।
क्यों पैदा हुई यह स्थिति?
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर गैस और तेल की आपूर्ति व्यवस्था चरमरा गई है। लखनऊ में सोमवार को कई केंद्रों पर सिलेंडरों की आपूर्ति नहीं हुई और संचालकों को अगली तारीख का इंतजार करने को कहा गया है।
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