विश्व के लिए मिसाल बनी बानी: भारत में पहली बार हाथियों पर हुआ एक्यूपंक्चर का सफल प्रयोग, वाइल्डलाइफ एसओएस की बड़ी कामयाबी

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मथुरा: दो साल पहले उत्तराखंड की रेल पटरियों पर एक ऐसी त्रासदी हुई थी जिसने एक 9 महीने की मासूम हथिनी को न केवल अनाथ कर दिया, बल्कि उसे उम्र भर के लिए अपाहिज होने की कगार पर खड़ा कर दिया। आज वही नन्ही हथिनी, जिसे दुनिया ‘बानी’ के नाम से जानती है, मथुरा स्थित वाइल्डलाइफ एसओएस के हाथी अस्पताल में अपनी रिकवरी के दो साल पूरे होने का जश्न मना रही है।

अंधेरे से उजाले तक का सफर

तेज रफ्तार ट्रेन की टक्कर ने बानी के पिछले हिस्से को लकवाग्रस्त (Paralyzed) कर दिया था। जब उसे मथुरा लाया गया, तो वह अपने पैरों पर खड़ी तक नहीं हो सकती थी। लेकिन वाइल्डलाइफ एसओएस की पशु चिकित्सा टीम और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के साझा प्रयासों ने चमत्कार कर दिखाया।

उपचार की आधुनिक और पारंपरिक तकनीकें

बानी को फिर से पैरों पर खड़ा करने के लिए विज्ञान और आयुर्वेद का अनोखा संगम अपनाया गया:

​एक्यूपंक्चर और लेजर थेरेपी: भारत में पहली बार किसी हाथी के इलाज के लिए इन तकनीकों का इस्तेमाल हुआ।
​हाइड्रोथेरेपी: पानी में कसरत के जरिए उसकी मांसपेशियों को सक्रिय किया गया।

विशेष सुरक्षा कवच: बानी अब विशेष रूप से तैयार ‘सुरक्षात्मक जूते’ पहनकर चलती है, ताकि उसके पैर घिसने से बचे रहें।

​फलों के केक से मनाया गया जश्न

अपनी रिकवरी के दो साल पूरे होने पर बानी को एक शाही दावत दी गई। उसके लिए चावल, तरबूज, पपीता, अमरूद, केला और खजूर से बना एक विशेष ‘फ्रूट केक’ तैयार किया गया। सर्दियों से बचाने के लिए उसके पास हैलोजन लाइटें, तिरपाल की जैकेट और गर्म बिस्तरों का खास इंतजाम रहता है।

एक दर्दनाक याद और चेतावनी

वाइल्डलाइफ एसओएस के सीईओ कार्तिक सत्यनारायण कहते हैं, “बानी का ठीक होना एक चमत्कार है, लेकिन यह कहानी रेल पटरियों पर दम तोड़ते हाथियों की एक दर्दनाक याद भी है। बानी बच गई, लेकिन उसकी माँ नहीं बच पाई। हमें हाथियों के प्रवासी मार्गों को सुरक्षित करना ही होगा ताकि भविष्य में कोई और ‘बानी’ अनाथ न हो।”

Dr. Bhanu Pratap Singh