देश में लोकतंत्र की बुनियादी शिला को किया जा रहा है कमजोर, राहुल बोले- ​”बीजेपी के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी क्यों गायब हो जाती है?”

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​नई दिल्ली: देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के बाद सियासत गर्मा गई है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने एक तीखी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए केंद्र सरकार पर बड़ा हमला बोला है। राहुल गांधी ने इसे एक सोची-समझी साजिश करार दिया है और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह के शामिल होने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में मांग की है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए।

​गुरुवार को मीडिया को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि ज्ञानेश कुमार को तत्काल प्रभाव से रिजाइन कर देना चाहिए। हमारे पास इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। ‘वोट चोरी’ के इस गंभीर आरोप को सिद्ध करने के लिए जो संवैधानिक पद आज ज्ञानेश कुमार संभाल रहे हैं, उन्हें इस पर बहुत सीरियसली सोचना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह इस पूरी साजिश में सीधे तौर पर शामिल हैं।

उन्होंने कड़े शब्दों में आरोप लगाते हुए कहा कि ये लोग देशद्रोही हैं। राहुल गांधी ने कहा कि आप साल 2023 से देख रहे हैं कि मैं लगातार ठोस सबूतों के साथ अपनी आवाज उठाता रहा हूँ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने मिलकर इस देश की लोकतांत्रिक आधारशिला को तहस-नहस करने की कोशिश की है। इतिहास गवाह है कि ऐसा कोई प्रधानमंत्री नहीं रहा जिसके खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी (सरकार विरोधी लहर) का असर न दिखा हो।

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि लोकसभा और तमाम विधानसभा चुनावों में सुनियोजित तरीके से हेरफेर की जा रही है और वोटिंग के अधिकारों को खत्म किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर खुद दो चुनाव आयुक्तों ने सवाल खड़े किए हैं और देश के सभी चुनावों में धांधली हुई है।

उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर बीजेपी हर चुनाव कैसे जीत जाती है और उनके खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी का असर क्यों देखने को नहीं मिलता? राहुल ने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में अमूनन हर सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर होती है, इंदिरा गांधी जी बांग्लादेश युद्ध जीतने के बाद भी चुनाव हार गई थीं, फिर भाजपा के मामले में ऐसा ব্যতিক্রম क्यों है? अचानक से देश से एंटी-इंकंबेंसी पूरी तरह गायब हो जाती है।

सद्दाम हुसैन के इराक में एंटी-इंकंबेंसी नहीं होती, उत्तर कोरिया में यह नहीं होती

कांग्रेस नेता ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि महाराष्ट्र का राजनीतिक रुख अचानक बदल जाता है, उत्तर प्रदेश में कभी समाजवादी पार्टी तो कभी बीएसपी की सरकार आती है और अचानक हवा का रुख बदल जाता है, ठीक इसी तरह मध्य प्रदेश और गुजरात में भी यह लहर गायब हो जाती है। यह हमारे लिए एक बुनियादी और गंभीर सवाल बना हुआ है। हम किसी राजनेता की व्यक्तिगत लोकप्रियता को समझ सकते हैं, हम किसी भी सरकार के कामकाज का आकलन कर सकते हैं, लेकिन हम यह कतई नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर यह एंटी-इंकंबेंसी गायब कैसे हो जाती है? सद्दाम हुसैन के तानाशाही इराक में कभी एंटी-इंकंबेंसी नहीं होती थी, उत्तर कोरिया में ऐसी कोई लहर नहीं दिखती। इस धरती पर ऐसा कोई जीवंत लोकतंत्र नहीं है जहां सत्ता विरोधी लहर न देखने को मिले। देश के हर प्रधानमंत्री के खिलाफ कभी न कभी एंटी-इंकंबेंसी का सामना करना पड़ा है, चाहे वह इंदिरा गांधी रही हों या फिर अटल बिहारी वाजपेयी, लेकिन भाजपा के मामले में यह परिपाटी पूरी तरह गायब है।

​राहुल ने आगे कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का चयन देश के प्रधानमंत्री द्वारा किया गया है। आज कोई भी समझदार राजनेता ऐसी बात खुलकर नहीं बोल सकता। मैंने अपने 50 साल के राजनीतिक जीवन में ऐसा कभी नहीं देखा जो आज हो रहा है। उन्होंने सवाल किया कि आखिर बीजेपी पर एंटी-इंकंबेंसी का असर क्यों नहीं पड़ रहा है? हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी परिणाम पूरी तरह से प्रभावित किए गए हैं। यह हमारे लिए एक मूल प्रश्न है कि हिंदुस्तान की सबसे बड़ी राजनैतिक ताकत और जनता का मिजाज आखिर कहां गायब हो जाता है?

वोट की चोरी अब कानून की चोरी बन गई है

उन्होंने स्पष्ट किया कि वे हवा में कोई बेसिर-पैर की बातें नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने इसके पुख्ता सबूत देश के सामने रखे हैं। उन्हें इस बात की सौ प्रतिशत जानकारी है कि विधानसभा और आम चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली को अंजाम दिया गया है। जिन दो चुनाव आयुक्तों का जिक्र किया जा रहा है, उन्हें भी अमित शाह द्वारा ही चुना गया था। इस पूरी चुनावी गड़बड़ी के लिए सीधे तौर पर ज्ञानेश कुमार जिम्मेदार हैं।

राहुल गांधी ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अब ‘वोट की चोरी’ का यह खेल आगे बढ़कर ‘कानून की चोरी’ बन चुका है। यदि कोई सांसद चुनाव में वोट चुराकर चुना गया है, तो वह चुनावी रूप से पूरी तरह गैर-कानूनी है। हैरानी की बात यह है कि वर्तमान व्यवस्था में चुनाव आयोग के खिलाफ किसी भी प्रकार की स्वतंत्र जांच नहीं की जा सकती है। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग के भीतर से ही कई जानकारियां लीक होकर सामने आ रही हैं।

Dr. Bhanu Pratap Singh