दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों का दौर खत्म: सरकार ने नए धरना स्थलों की घोषणा की, रामलीला मैदान और बुराड़ी ग्राउंड हुए तय

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नई दिल्ली: ​अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर राजनीतिक या सामाजिक विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला थम गया है। केंद्र सरकार ने एक विशेष समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए जंतर-मंतर को आधिकारिक तौर पर निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया है। इसके विकल्प के रूप में अब दिल्ली में तीन नए स्थलों रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली स्थित सीबीडी (CBD) ग्राउंड को विरोध प्रदर्शनों और धरनों के लिए अधिकृत किया गया है।

​यह नया घटनाक्रम तब सामने आया है जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर (SIR) पर रोक लगाने की मांग को लेकर सोमवार को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए इस अनुमति को सिरे से खारिज कर दिया है।

​इससे पहले भी इसी मंच (CJP) ने नीट (NEET) पेपर लीक मामले में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर 20 जून से 25 जुलाई तक एक लंबा आंदोलन चलाया था। लगभग 36 दिनों तक चले उस हाई-प्रोफाइल प्रदर्शन के दौरान जाने-माने एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भी अनशन और भूख हड़ताल पर बैठे थे।

​गृह मंत्रालय ने विरोध-प्रदर्शनों और धरनों के आयोजन के लिए वैकल्पिक और बेहतर स्थानों की पहचान करने के वास्ते एक विशेष उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। इसी समिति की विस्तृत रिपोर्ट और सिफारिशों के आधार पर इन तीनों नए स्थानों को प्रदर्शनों के लिए अंतिम रूप से नामित किया गया है। इन नए निर्धारित स्थलों रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और सीबीडी ग्राउंड पर धरना-प्रदर्शन आयोजित करने की प्रक्रिया और तौर-तरीकों को विनियमित करने के लिए एक संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अलग से जारी की जाएगी। फिलहाल सरकार द्वारा जारी शुरुआती आदेश में इन गाइडलाइंस का ब्योरा नहीं दिया गया है।

जंतर-मंतर के प्रदर्शनों का इतिहास

राजधानी में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों का दौर साल 1993 से शुरू हुआ था। उससे पहले दिल्ली में बड़े पैमाने पर राजनीतिक रैलियां और प्रदर्शन संसद भवन के पास स्थित ‘बोट क्लब’ पर आयोजित किए जाते थे। लेकिन बाद में सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से बोट क्लब पर प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी गई, जिसके चलते जंतर-मंतर धरना-प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र बन गया।

इतिहास पर नजर डालें तो साल 1988 में बोट क्लब पर एक बहुत बड़ा किसान आंदोलन हुआ था, जिसमें मशहूर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में देश के कोने-कोने से भारी संख्या में किसान दिल्ली पहुंचे थे। इस विशाल आयोजन के बाद बोट क्लब पर अनियंत्रित भीड़ जुटाने और प्रदर्शन करने को लेकर प्रशासन की सख्ती बहुत ज्यादा बढ़ गई। आखिरकार, साल 1993 में बोट क्लब पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई।

​इसके बाद राजनीतिक दलों और संगठनों ने संसद के बेहद करीब होने के कारण जंतर-मंतर को धरना स्थल के रूप में चुन लिया, क्योंकि यहां से सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाना आंदोलनकारियों के लिए काफी सुगम था। धीरे-धीरे यह जगह देश की सबसे बड़ी विरोध प्रदर्शन स्थली के रूप में स्थापित हो गई। हालांकि, शुरुआती दौर में जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए कोई अलग या औपचारिक सरकारी अधिसूचना जारी नहीं की गई थी; बल्कि दिल्ली पुलिस द्वारा धीरे-धीरे अनुमति दिए जाने से यह व्यवस्था परंपरा का हिस्सा बन गई।

​परंतु, साल 2017 में जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों पर रोक लगाने का पहला बड़ा आधिकारिक आदेश सामने आया। उस क्षेत्र के आसपास निवास करने वाले स्थानीय नागरिकों ने लगातार होने वाले शोरगुल, लाउडस्पीकरों की आवाज और भारी गंदगी को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में गंभीर शिकायतें दर्ज कराई थीं। इसके बाद एनजीटी ने जंतर-मंतर पर हर तरह के धरने-प्रदर्शन तुरंत प्रभाव से रोकने और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का ऐतिहासिक निर्देश दिया था।

Dr. Bhanu Pratap Singh