लखनऊ: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की तैयारी कर रहे हजारों उम्मीदवारों के लिए अनिश्चितता के बादल गहरा गए हैं। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि अप्रैल-जुलाई 2026 में होने वाले ये चुनाव अब सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव के साथ या उसके ठीक बाद कराए जा सकते हैं।
क्यों टल सकते हैं चुनाव? (मुख्य कारण)
डेडिकेटेड OBC आयोग का कानूनी पेंच: इलाहाबाद हाईकोर्ट में हाल ही में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) के जवाब में सरकार ने माना है कि स्थानीय निकाय चुनावों के लिए ‘डेडिकेटेड पिछड़ा वर्ग आयोग’ का गठन जरूरी है। पुराने आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो गया था।
बिना नए आयोग की रिपोर्ट और ‘रैपिड सर्वे’ के, सीटों का आरक्षण तय करना सुप्रीम कोर्ट के ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूले का उल्लंघन होगा।
आरक्षण और सर्वे में समय की कमी: हाईकोर्ट में सरकार के हलफनामे के बाद, अब नया आयोग पूरे प्रदेश में पिछड़ों की आबादी का रैपिड सर्वे करेगा। इस प्रक्रिया, रिपोर्ट जमा करने और फिर नई आरक्षण सूची (Reservation List) तैयार करने में कम से कम 5 से 6 महीने का समय लग सकता है। इससे चुनाव की समय सीमा (जुलाई 2026) का पालन करना नामुमकिन लग रहा है।
2027 की ‘सेमीफाइनल’ रणनीति: राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा सरकार विधानसभा चुनाव (मार्च 2027) से महज कुछ महीने पहले पंचायत चुनाव कराने का जोखिम नहीं लेना चाहती। पंचायत चुनावों में अक्सर स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ता ही आमने-सामने होते हैं, जिससे गुटबाजी बढ़ती है। सरकार इसे टालकर सीधे विधानसभा चुनाव पर ध्यान केंद्रित कर सकती है।
उम्मीदवारों की बढ़ी धड़कनें
जिन भावी प्रधानों और जिला पंचायत सदस्यों ने पिछले साल से ही “गांव की सेवा” और प्रचार में लाखों रुपये खर्च कर दिए थे, उनके लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है। यदि चुनाव 2027 तक खिंचे, तो उनकी चुनावी रणनीति और बजट दोनों बिगड़ सकते हैं।
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