अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी और गबन की घटनाओं ने देश भर के करोड़ों भक्तों की आस्था को गहरा ठेस पहुँचाया है। इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की आधिकारिक सिफारिश पर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है। पिछले छह दिनों से लगातार एसआईटी द्वारा मैराथन जांच का दौर जारी है। इस बीच, दान के आभूषणों की चोरी के आरोपों में घिरे टिन्नू यादव को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई है।
एक प्रमुख न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट के अनुसार, राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के करीबी सहयोगी राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव ने एक दानदाता को यह तक कह दिया था कि “चांदी गला दी गई है, उसे भूल जाओ।” टिन्नू यादव पर राम मंदिर के दानपात्रों और चढ़ावे की सामग्री से करोड़ों रुपये के गबन का गंभीर आरोप है।
मामला तब और गंभीर हो गया जब जौनपुर के व्यापारी अजय विश्वकर्मा की शिकायत सामने आई। उन्होंने रामलला के लिए चांदी की चरण पादुका और रत्नों से जड़ा एक बेशकीमती हार चढ़ाया था, लेकिन उन्हें इसके बदले में कोई रसीद तक नहीं दी गई। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि दान की गई वे चरण पादुकाएं और रत्नों जड़ा हार अब पूरी तरह से गायब हैं।
एसआईटी ने मंदिर प्रबंधन से इन कीमती वस्तुओं का रिकॉर्ड और विवरण मांगा है, लेकिन अब तक इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल पाई है। इसी के साथ मामले में एक नया मोड़ तब आया जब एक पूर्व इंजीनियर दीनानाथ वर्मा ने मंदिर ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा पर निर्माण कार्य में कमीशनखोरी के गंभीर आरोप लगाए।
वर्मा ने दावा किया कि जब से अनिल मिश्रा को राम मंदिर के वित्तीय मामलों की जिम्मेदारी सौंपी गई, उन्होंने हर काम में 40 प्रतिशत तक कमीशन लेना शुरू कर दिया था। इन आरोपों के बाद, एसआईटी ने अनिल मिश्रा से करीब तीन घंटे तक गहन पूछताछ की है। वहीं, जांच दल अब टिन्नू यादव के खिलाफ बड़े एक्शन की तैयारी कर रहा है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में लवकुश मिश्रा पहले ही एसआईटी की हिरासत में है।
जांच के दौरान एसआईटी को यह भी पता चला है कि राम मंदिर के प्रबंधन में गंभीर स्तर पर चूक हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, मंदिर प्रशासन में किसी भी प्रकार के ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर’ (SOP) का पालन नहीं किया जा रहा था। वहां कार्यरत लोगों के पास कोई निश्चित जिम्मेदारी आधिकारिक रूप से तय नहीं थी, और मंदिर का पूरा कामकाज केवल मौखिक आदेशों के आधार पर ही चल रहा था, जिससे गबन और गड़बड़ियों का रास्ता साफ हो गया।
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