उत्तर प्रदेश के संभल में वर्ष 1978 में हुए भीषण दंगों के घाव भले ही चार दशक पुराने हो चुके हों, लेकिन अब उन घावों पर मरहम लगाने की कोशिश की जा रही है। संभल दंगे के शिकार हुए रस्तोगी परिवार को करीब 48 साल के लंबे संघर्ष के बाद न्याय की उम्मीद जगी है।
दंगों की विभीषिका के चलते वर्ष 1979 में अपना घर-बार छोड़कर पलायन करने पर मजबूर हुए इस परिवार को योगी आदित्यनाथ सरकार ने सम्मान के साथ वापस बसाने की पहल की है। इसी कड़ी में, प्रदेश के सहकारिता मंत्री जेपीएस राठौर ने पीड़ित परिवार को 100 वर्ग मीटर जमीन का पट्टा सौंपा है।
क्या है खौफनाक अतीत?
‘हिंदुस्तान लाइव’ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में जीवन यापन कर रहे कपिल रस्तोगी ने उस दौर की भयावह यादों को साझा करते हुए बताया कि 29 मार्च 1978 का दिन उनके परिवार के लिए काल बनकर आया था। उस दिन दंगाइयों की उग्र भीड़ ने उनके दादा रामशरण दास रस्तोगी की किराने की दुकान को न केवल लूट लिया, बल्कि विरोध करने पर उन पर चाकुओं से निर्मम हमला कर उनकी हत्या कर दी।
हैवानियत की हद तब पार हो गई जब दादा के शव को एक कुएं में फेंक दिया गया। उस भयानक मंजर के बाद लगातार मिल रही धमकियों और असुरक्षा के माहौल के बीच, रस्तोगी परिवार को अपना पुश्तैनी शहर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
विधानसभा में गूंजी आवाज़ और जागी उम्मीद
कपिल रस्तोगी ने बताया कि जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा सत्र के दौरान संभल दंगों का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाया, तो परिवार में न्याय की एक नई किरण जगी। इसके बाद, पीड़ित परिवार ने सरकार से गुहार लगाई, जिस पर प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई की।
इस अवसर पर सहकारिता मंत्री जेपीएस राठौर ने कहा कि 1978 के उस दंगे में 100 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और अनगिनत घर राख के ढेर में बदल गए थे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ऐसे सभी पीड़ित परिवारों की पहचान कर उन्हें 100 वर्ग मीटर भूमि उपलब्ध करा रही है, ताकि वे वापस अपने शहर लौटकर सम्मान के साथ अपनी नई जिंदगी की शुरुआत कर सकें। यह पहल न केवल पुनर्वास का हिस्सा है, बल्कि राज्य सरकार की ओर से दंगों के पीड़ितों को दी गई एक बड़ी नैतिक जीत के रूप में देखी जा रही है।
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