संगीत के बारे में पिछली कुछ सदियों की चर्चा बिना कव्वाली के हो ही नहीं सकती. दूर उधर इस्तांबुल से लेकर ईरान, काबुल तक या सिंध, लाहौर और पेशावर से लेकर पंजाब, अवध और हैदराबाद तक, कव्वाली संगीत का, गायकी का एक स्थापित तरीका है. इस तरीके में महफ़िल-ए-समाअ की पहली रौशनी से लेकर कितने ही दरगाहों के गुगुल-लोबान सुलगते-महकते मिल जाते हैं. बादशाहों की खाली गोदों से लेकर निर्धनतम की रोटी की आस तक और भक्ति से लेकर प्रेम तक की कितनी सीढ़ियां इसके सुर बनकर इसे गुनगुनाती रही हैं.
सिनेमा से पहले कव्वाली का दायरा और भी व्यापक था. लोक प्रस्तुतियों से लेकर महफिलों और जलसों तक इसका जलवा रहा है. और यह जलवा सिनेमा के पर्दे पर भी जब-जब उतरा, सिनेमाई संगीत को एक हाई प्वाइंट तक लेकर गया लेकिन इतने गहरे उतरे-जमे इस तरीके को हमेशा या तो सूफियों-संतों के कलाम तक वर्गीकृत करके रख छोड़ा गया और या फिर गज़ल की बहन, शेरो-शायरी की बेटी समझ लिया गया. कव्वाली गायकी की एक विधा, एक खास शैली तो बनी रही लेकिन उसे गीत-कवित्त के एक विशेष तरीके के तौर पर वर्गीकृत करने की जेहमत किसी ने नहीं उठाई.
हिंदुस्तान और हिंदी में कव्वाली का यह वनवास अब 21वीं सदी के दूसरे दशक में खत्म हो रहा है. इस श्रापित, परित्यक्त, उपेक्षित अवस्था से कव्वाली को निकालने का एक बड़ा काम एक छोटी सी उम्र के युवा कवि, उर्दू प्रेमी और सूफीवाद के आस्थामना सुमन मिश्र ने कर दिखाया है. तक़रीबन 800 पेज में हिंदुस्तानी और फारसी सूफी कलामों का यह संग्रह दो वॉल्यूम में प्रकाशित हुआ है. पहला भाग फारसी सूफी कलाम का पिटारा है.
वर्ष 858 से लेकर 1996 तक फारसी भाषा में 50 सूफियों-संतों और शायरों ने जो रचा, कहा, उसकी बानगी इस हिस्से में वर्णित है. वरक दर वरक जब इस हिस्से में आप उतरेंगे तो आप पाएंगे कि बायें पन्नों पर देवनागरी में लिखे फारसी के कलाम हैं और दाहिने पन्नों पर उनसे रूबरू उनके तर्जुमे हैं जिन्हें बखूबी निभाया है अब्दुल वासे ने. शानदार और सरल अनुवाद है जो मिसरी की डली की तरह मायने को घोलता चला जाता है.
दूसरा हिस्सा हिंदुस्तानी सूफी कलामों का संग्रह है. यह कव्वाली के 13वीं सदी से अभी तक के सफर का चलचित्र जैसा है. लगभग 60 कलाम नवाज़ और उसके बाद मौके के हिसाब से वर्गीकृत कव्वाली जैसे सेहरा, सावन, सलाम, होली, बसंत, गागर, चादर. ऐसा याद नहीं पड़ता कि कव्वाली के इतिहास और स्थापत्य के साथ-साथ उसके शिल्प और संरचनात्मक समग्रता को लेकर इससे पहले कभी कोई ऐसा काम देखा हो. और इसीलिए ये सुंदर सारगर्भित संग्रह पठनीय भी है और संग्रहणीय भी.
इस संग्रह को लेकर दो बातें बताना बेहद ज़रूरी है. पहली तो यह कि हिंदुस्तान में और हिंदी में कव्वाली को लेकर इस तरह का शायद यह पहला काम है. इससे हुआ यह है कि कव्वाली को गायकी के मंच से अदब के आंगन तक का रास्ता मिल गया है. कव्वाली का, कलामों का इस तरह से संग्रह दरअसल कव्वाली का नया पता है. उसका अपना घर. उसकी अपनी पहचान. जो मंच से सुनाई तो देती थी लेकिन अदब की जिल्द बंधी दुनिया में उसका अपना कोई वजूद न था. इस संग्रह के बहाने कव्वाली को एक अलग विधा के पद्य की तरह स्थापित करने के लिए अब पर्याप्त सबूत और सापेक्षता हासिल हो गई है. इस दृष्टि से देखें तो यह एक ऐतिहासिक काम है जिसे बहुत लंबे समय तक याद किया जाएगा.
दूसरी अहम बात यह है कि दरगाहों के उर्स, सिनेमा के कैसेटों, एलबमों और मंचों पर मचलती कव्वाली के अलावा एक इतिहासबोध के साथ कव्वाली को देख पाने और समझ पाने की गुंजाइश बहुत मुश्किल थी. लेकिन इस संग्रह ने कव्वाली शब्द के साथ जोड़ दिए गए हल्केपन की शल्य चिकित्सा कर दी है. अब सूफियों के कलाम से सजी और परंपरा के सुरों से धजी कव्वाली को एक सम्मानजनक स्थान देने में यह संकलन एक अहम पड़ाव बन गया है. इस संकलन को देखकर केवल मज़ा नहीं आता, कव्वाली, उसके इतिहास और दायरे, उसके संदर्भ और कथन के प्रति एक विशालता का अनुमान होता है और आंखें श्रद्धा से नत हो जाती हैं.
सूफी कलामों का यह संग्रह इतिहास की एक यात्रा भी है. यात्रा, जो सूफी विचारधारा का सफर है. जो मौसिकी का सफर है. जो इंसान के बढ़ने-बदलने के दौरान इंसान को इंसान बनाए रखने के गीतों का सफर है. इस सफर का बोध इस संग्रह के दोनों हिस्सों के प्रस्तावना में दिख जाता है. जिस मेहनत और लगन से, गहराई और समग्रता से, वैविध्य और सहजता से इन्हें लिखा गया है, वो खुद में एक शानदार काम है. सुमन के इन संग्रहों से रूबरू न होना, संगीत के किसी सुंदर, सजीले और महान राग का अनसुना रह जाना होगा.
-एजेंसियां
- अयोध्या दीपोत्सव पर सीएम योगी की देशवासियों से अपील: “जब राम जन्मभूमि पर जलें दीप, तब अपने घर-आंगन को भी करें रोशन” - November 7, 2026
- Agra में 200 ग्रामीणों को मिला निःशुल्क उपचार, 10 मरीजों की आँखों का ऑपरेशन भी होगा - November 7, 2026
- भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान की विरासत को ध्वस्त करने का आरोप: वाराणसी का वीडियो शेयर कर बोले अखिलेश— “भाजपा नफरत की आग में देश का नुकसान कर रही” - November 7, 2026