नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देते हुए एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी विवाह को कानूनन अमान्य (Void) या रद्द घोषित कर दिया जाता है, तब भी पत्नी अपने पति से स्थायी गुजारा भत्ता और मुकदमे के दौरान अंतरिम भरण-पोषण पाने की हकदार रहेगी। इस निर्णय से हिंदू विवाह अधिनियम को लेकर लंबे समय से चली आ रही कानूनी उलझनों पर विराम लग गया है।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ जस्टिस अभय एस. ओका, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने सुनाया। अदालत ने कहा कि विवाह की वैधता समाप्त होने से महिला का आर्थिक संरक्षण खत्म नहीं हो जाता और कानून का उद्देश्य किसी पत्नी को बेसहारा छोड़ना नहीं है, बल्कि उसे सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार देना है।
धारा 24 और 25 की व्याख्या में आया स्पष्ट संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 और धारा 25 की व्यापक और उद्देश्यपरक व्याख्या करते हुए दो अहम बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट की—
1) स्थायी गुजारा भत्ता (धारा 25)
अदालत ने कहा कि यदि किसी विवाह को धारा 11 के तहत अमान्य घोषित किया जाता है, तब भी पत्नी धारा 25 के अंतर्गत स्थायी गुजारा भत्ता मांग सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में इस्तेमाल शब्द “कोई भी डिक्री” के दायरे में विवाह को शून्य घोषित करने वाला आदेश भी आता है। हालांकि, भत्ता मिलेगा या नहीं यह अदालत परिस्थितियों, दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति और तथ्यों के आधार पर तय करेगी।
2) मुकदमे के दौरान अंतरिम भरण-पोषण (धारा 24)
शीर्ष अदालत ने यह भी साफ किया कि मुकदमा लंबित रहने के दौरान पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की मांग कर सकती है। यदि पत्नी के पास आय का पर्याप्त साधन नहीं है तो केवल यह कहकर राहत नहीं रोकी जा सकती कि विवाह प्रथम दृष्टया अवैध प्रतीत हो रहा है।
पति की दलील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
मामले में पति की ओर से यह तर्क दिया गया था कि अमान्य विवाह का कानून में कोई अस्तित्व नहीं होता, इसलिए पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ऐसी संकीर्ण व्याख्या कानून की आत्मा और महिला सुरक्षा के उद्देश्य को कमजोर करती है।
महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय पर जोर
वहीं पत्नी की ओर से अदालत में यह दलील रखी गई कि धारा 25 सामाजिक न्याय और महिला संरक्षण की भावना से जुड़ा प्रावधान है। विवाह को अवैध ठहराकर महिला को आर्थिक सहायता से वंचित करना अन्यायपूर्ण होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसी दृष्टिकोण को स्वीकार करते हुए महिलाओं के हित में स्पष्ट संदेश दिया।
कानून केवल तकनीकी नहीं, मानवीय दृष्टि से भी पढ़ा जाए
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कानून की व्याख्या केवल तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ और मानवीय दृष्टिकोण के अनुरूप होनी चाहिए। विवाह वैध हो या अमान्य घोषित किया जाए महिला की गरिमा और जीवनयापन का अधिकार सर्वोपरि है।
इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और आर्थिक सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में ऐसे मामलों में न्याय की नई राह तय करेगा।
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