आगरा। ताजनगरी का ‘फेफड़ा’ कहे जाने वाले ऐतिहासिक पालीवाल पार्क की हरियाली अब कंक्रीट के साये में है। पिछले छह महीनों से 72 एकड़ में फैले इस राजकीय उद्यान में बड़े पैमाने पर सिविल वर्क चल रहा है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे प्रोजेक्ट को बेहद ‘गोपनीय’ रखा गया है। न तो मौके पर कोई सूचना बोर्ड (Project Information Board) लगा है और न ही जिम्मेदार विभाग कुछ बोलने को तैयार है।
अनिवार्य नियमों की सरेआम अनदेखी
भारत सरकार और राज्य सरकार के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि किसी भी सार्वजनिक निर्माण स्थल पर परियोजना का विवरण, लागत, ठेकेदार का नाम और समय सीमा का बोर्ड लगाना अनिवार्य है। पालीवाल पार्क में हो रहे निर्माण में इन नियमों को ताक पर रख दिया गया है। जनता यह जानने को बेताब है कि उनके प्रिय पार्क में क्या बन रहा है और इसमें जनता की गाढ़ी कमाई का कितना पैसा खर्च हो रहा है?
पक्का निर्माण: क्या पार हो रही है लक्ष्मण रेखा?
पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय ईको क्लब के संचालक प्रदीप खंडेलवाल ने इस पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा, “एनजीटी (NGT) के दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी भी ग्रीन ज़ोन में पक्का निर्माण एक निर्धारित सीमा (5-10%) से अधिक नहीं हो सकता। पालीवाल पार्क में जिस रफ्तार से निर्माण हो रहा है, उससे आशंका है कि यह पार्क अब उद्यान कम और ‘कंक्रीट का जंगल’ अधिक बनता जा रहा है।”
राजकीय उद्यान विकास समिति की संदिग्ध चुप्पी
इस पूरे प्रकरण में राजकीय उद्यान विकास समिति, आगरा मंडल की भूमिका सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। निर्माण कार्य समिति की देखरेख में है या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है। समिति ने अब तक न तो कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी की है और न ही किसी अधिकारी ने जनता के बीच आकर स्थिति साफ की है। प्रशासनिक अधिकारियों की यह निष्क्रियता पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करती है।
एनजीटी से हस्तक्षेप की मांग
सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि यदि प्रशासन मौन रहा, तो यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) तक पहुंचना तय है। यह केवल एक पार्क की बात नहीं है, बल्कि शहर के पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति के साथ हो रहे खिलवाड़ का मामला है।
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