वैश्विक मानचित्र पर सारनाथ: यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ ‘प्राचीन बौद्ध स्थल’, पीएम मोदी और सीएम योगी ने दी देश को बधाई

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वाराणसी/बुसान। भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए आज एक ऐतिहासिक दिन है। दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित ‘विश्व धरोहर समिति’ के 48वें सत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए, भारत के “सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल” को यूनेस्को (UNESCO) की प्रतिष्ठित विश्व धरोहर सूची में आधिकारिक रूप से शामिल कर लिया गया है। यह उपलब्धि भारत के गौरव को बढ़ाने वाली है और देश की यह 45वीं धरोहर बन गई है।

​इस ऐतिहासिक सफलता पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय संस्कृति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए देशवासियों को बधाई दी है।

सारनाथ का गौरवशाली इतिहास और महत्व

वाराणसी में स्थित इस प्राचीन बौद्ध स्थल में मुख्य रूप से ‘चौखंडी स्तूप’ और सारनाथ के ‘पुरातात्विक अवशेष’ (धमेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार और अशोक स्तंभ) शामिल हैं। बौद्ध परंपरा में इस स्थल को ऋषिपत्तन, इषिपत्तन और मृगदाव जैसे पवित्र नामों से भी जाना जाता है। यही वह पावन स्थान है, जहाँ छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ के रूप में जाना जाता है। इसी घटना से बौद्ध संघ की स्थापना हुई और ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ के सिद्धांतों का सूत्रपात हुआ। स्वयं भगवान बुद्ध ने सारनाथ को बौद्ध तीर्थयात्रा के चार सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक माना था।

​18 महीने की गहन प्रक्रिया के बाद मिली मान्यता

सारनाथ को पहली बार 1998 में विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल किया गया था। जनवरी 2025 में इसके नामांकन का औपचारिक प्रस्ताव समिति के समक्ष रखा गया। इसके बाद आईसीओएमओएस (ICOMOS) मिशन द्वारा स्थल का निरीक्षण और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ 18 महीने लंबी चली गहन प्रक्रिया के उपरांत, बुसान में समिति के सदस्यों ने इसे वैश्विक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान की।

​किन मानदंडों पर मिली मान्यता?

यूनेस्को ने सारनाथ को दो प्रमुख मानदंडों (Criteria) के आधार पर विश्व धरोहर घोषित किया है:

मानदंड (iii): यह स्थल बौद्ध तीर्थयात्रा के प्रमुख केंद्रों में से एक है, जो यहाँ सदियों से निर्मित और पुनर्निर्मित धार्मिक इमारतों और स्मारकों से प्रमाणित होता है।

मानदंड (vi): यह स्थल सीधे तौर पर भगवान बुद्ध के जीवन की उन महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा है, जो बौद्ध समुदाय के लिए अत्यंत पावन हैं—विशेषकर उनका प्रथम उपदेश और शिष्यों से प्रथम मिलन।

​बौद्ध परिपथ को मिला नया संबल

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यहां की गई खुदाई में 16 सदियों (5वीं सदी ईसा पूर्व से 12वीं सदी ईस्वी तक) के विभिन्न दौरों की बस्तियों के साक्ष्य मिले हैं। अब सारनाथ के शामिल होने से बौद्ध धर्म के चार सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से तीन—लुंबिनी (नेपाल), बोधगया (बिहार) और सारनाथ (उत्तर प्रदेश)—विश्व धरोहर की सूची का हिस्सा बन गए हैं।

Dr. Bhanu Pratap Singh