आगरा। फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड में करुणानिधान परिवार की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के पांचवें दिवस राधाष्टमी के पावन अवसर पर भक्ति, प्रेम और सद्भाव का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यास मोरारी बापू ने श्रीरामचरितमानस के बालकांड की चौपाई
“एक बार त्रेता जुग माहीं।
संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥
संग सती जगजननि भवानी।
पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥” के साथ कथा का शुभारंभ किया। इसके बाद गुजराती भजन की पंक्तियां “तुम्हारो श्याम छे साधु, हमारो राम छे साधु” दोहराते हुए बापू ने साधुता और समभाव का संदेश दिया। राधाष्टमी के कारण जैसे ही राधा नाम की धुन छिड़ी, पूरा कथा पंडाल “राधे-राधे” के जयघोष से गूंज उठा।
राधाष्टमी पर बरसाने वाली की भक्ति में डूबा पंडाल
बापू ने कहा कि आज बरसाने वाली राधारानी की अष्टमी है। राधा नाम का स्मरण करते हुए उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेम और भक्ति के भाव में डुबो दिया। उन्होंने कहा कि भगवान साधुओं के परित्राण के लिए बार-बार अवतार लेते हैं।
बापू ने कहा, “भगवान तेरे या मेरे नहीं, बल्कि हमारे होते हैं।” परमात्मा को किसी सीमा, जाति या व्यक्तिगत अधिकार में बांधा नहीं जा सकता। भक्त जिस भाव से उन्हें पुकारता है, भगवान उसी भाव में उसके निकट आते हैं।
“चौपाइयों का गान ही हमारा सोमरस”
बापू ने कहा कि श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों का गान ही हमारा सोमरस है। संसार में इससे बड़ा कोई रस नहीं। उपनिषदों की प्रेरणा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कथा का श्रवण यदि परम सुख और एकाग्रता के साथ किया जाए तो जीवन की यात्रा में किसी न किसी रूप में ईश्वर के दर्शन अवश्य होते हैं।
उन्होंने पार्वती जी का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि उन्होंने रामकथा परम सुख के साथ सुनी, इसलिए आगे चलकर उन्हें मार्ग में प्रभु श्रीराम के दर्शन हुए। इसी प्रकार राजा परीक्षित ने भी कथा को जिस भाव से सुना, कथा-विराम के समय उनके सामने केवल मृत्यु का भय नहीं रहा, बल्कि शुकदेव जी में ही उन्हें श्रीकृष्ण के दर्शन होने लगे।
कलियुग में नाम ही सबसे बड़ा सहारा
प्रश्नोत्तरी में एक भक्त ने पूछा कि कलियुग में परमात्मा का नाम लेना अधिक महत्वपूर्ण है या शास्त्रों का ज्ञान। बापू ने कहा कि कलियुग में नाम लेना ही मुख्य साधना है। उन्होंने कहा—ज्ञान प्राप्त करने के लिए शास्त्र अवश्य पढ़ें, लेकिन कुछ करें या न करें, भगवान का नाम जरूर लें।
उन्होंने कहा कि जीवन के तमाम विषयों—कुंडली, ज्योतिष, वास्तु और अन्य चिंताओं—के ऊपर भी राम का भरोसा सबसे बड़ा है। मनुष्य को अंततः अपने भीतर के विश्वास और प्रभु के नाम का आश्रय लेना चाहिए।
गंगा-जमुनी सद्भाव का दिया संदेश
हिंदू-मुस्लिम सद्भाव से जुड़े प्रश्न पर बापू ने कहा कि हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। उन्होंने पुराने प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि हनुमान जी के सामने सुल्तान खां सारंगी बजाते थे और आज भी उनके गांव में मुस्लिम परिवार जय श्रीराम कहते हैं।
गुरु की सबसे बड़ी सेवा उनकी आज्ञा का पालन
बापू ने कहा कि गुरु की सबसे बड़ी सेवा उनके निर्देशों का सहज भाव से पालन करना है। ऋषि वह है जो निरंतर आत्ममंथन करता है और अपने अंतर्मन से जुड़ा रहता है। जो व्यक्ति राग, द्वेष, अहंकार, अस्मिता और आसक्ति जैसे भावों से ऊपर उठता है, वही साधुता की ओर बढ़ता है।
जिस घर में प्रेम है, वहीं रामराज्य
बापू ने रामराज्य की परिभाषा घर-परिवार से जोड़ते हुए कहा कि जिस घर में देवरानी-जेठानी मुस्कुराकर मिलें, सास अपनी बहू को बेटी जैसा स्नेह दे और माता-पिता अपने बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें, वह घर भी रामराज्य के समान है।
उन्होंने कहा कि रामराज्य केवल शासन व्यवस्था का नाम नहीं, बल्कि परस्पर प्रेम, सम्मान, सहयोग और संवेदना से निर्मित जीवन व्यवस्था है।
“साधना मजबूत हो तो सहयोग अपने आप मिलता है”
कथा में जैन संत लोकेश मुनि ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि पहले राजा का चयन रानी की कोख से ही हो जाता था, जबकि आज जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक देश के शीर्ष पदों पर बैठे लोग भी मोरारी बापू के प्रति आस्था और सम्मान रखते हैं।
लोकेश मुनि ने कहा कि बापू में ऋषि का यश और मुनि जैसी तपस्या दोनों दिखाई देती हैं। उन्होंने बापू के शांति संदेश और मानवता के लिए किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि साधना मजबूत हो तो सहयोग के मार्ग स्वयं खुलते हैं। उन्होंने बापू के आशीर्वाद और मार्गदर्शन से उन्हें अमेरिकी संसद में शांति संवाद रखने का अवसर मिलने तथा वैश्विक शांति सम्मेलनों में सहभागिता का भी उल्लेख किया।
बापू की 984वीं कथा का सफर बना आकर्षण
कथा स्थल पर मोरारी बापू की अब तक की कथाओं का विस्तृत सफरनामा भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बड़े पोस्टर पर बापू की पहली कथा से लेकर 984वीं कथा तक के कथा स्थलों और यात्राओं का विवरण सूचीबद्ध किया गया है।
बताया गया कि बापू ने कथा का सिलसिला गुजरात से शुरू किया। प्रारंभ में लगातार 45 कथाएं गुजरात में हुईं, इसके बाद महाराष्ट्र में दो कथाएं हुईं और फिर यह यात्रा देश के विभिन्न हिस्सों से होती हुई विदेशों तक पहुंची। अब तक 984 कथाओं तक पहुंच चुकी इस कथा-यात्रा में बापू को कथा करते हुए 68 वर्ष हो चुके हैं।
बापू के साथ सेल्फी के लिए लगी कतार
कथा परिसर में बापू के चित्रों के साथ बनाए गए सेल्फी प्वाइंट पर भी श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा है। लंबी कतार लगाकर लोग अपनी स्मृतियों को संजोने के लिए सेल्फी लेते नजर आ रहे हैं। भक्ति के साथ श्रद्धालुओं में बापू की कथा-यात्रा से जुड़ी स्मृतियां अपने साथ ले जाने का उत्साह भी दिखाई दे रहा है।
शहनाई से हुआ भक्तों का स्वागत, जुगलबंदी ने बांधा समां
कथा स्थल पर पहुंचने वाले भक्तों का स्वागत शहनाई की मधुर धुनों से किया जा रहा है। वहीं “दर्शन दो घनश्याम, मोरी अखियां प्यासी” जैसे भजन की प्रस्तुति ने कथा पंडाल को संगीतमय बना दिया। बाबा मुरली और कृष्ण दास कबीर की स्वर-जुगलबंदी पर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। स्वयं मोरारी बापू भी इस प्रस्तुति से प्रभावित नजर आए।
रोज 4000 से अधिक श्रद्धालु ग्रहण कर रहे प्रसादी
नौ दिवसीय रामकथा के साथ श्रद्धालुओं के लिए लगातार प्रसादी की व्यवस्था भी की जा रही है। प्रतिदिन 4000 से अधिक लोग प्रसादी ग्रहण कर रहे हैं।
कथा के पांचवें दिवस राधाष्टमी के पावन अवसर पर अंत में “राधे तेरे चरणों की रज पाऊं किशोरी, तेरे चरणों की रज पाऊं” की भावपूर्ण धुन के साथ कथा का विश्राम हुआ। राधा नाम की मधुरता और रामनाम की शक्ति में डूबा पूरा कथा पंडाल देर तक भक्तिरस में सराबोर रहा।
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