प्रेम विवाह यानी जोखिम भरा फैसला? ऑनलाइन मैचमेकिंग सर्विस ट्रूली मैडली के भारत में 1.1 करोड़ से भी ज्यादा यूजर हैं. इसे भारतीय समाज के ताने-बाने के बीच बड़ा आंकड़ा माना जा सकता है. ऐसे और भी कई ऐप हैं जो खूब चलन में हैं, लेकिन जोड़ों का प्रेम विवाह तक नहीं पहुंच पाता.
2018 में 160,000 से ज्यादा परिवारों के सर्वे में, 93% विवाहित भारतीयों ने कहा कि उनकी शादी अरेंज यानी मां-बाप की मर्जी से हुई थी. सिर्फ 3% ने “लव मैरिज” की थी और अन्य 2% ने “लव-कम-अरेंज्ड मैरिज” की थी. 2021 की प्यू रिसर्च बताती है कि भारत में 80% मुसलमानों की राय है कि उनके समुदाय के लोगों को दूसरे धर्म में शादी करने से रोकना महत्वपूर्ण है. वहीं ऐसी ही राय 65% हिंदू रखते हैं. हालांकि, कुछ दशक पहले की तुलना में अब लड़कियों को फैसले लेने के मौके मिल रहे हैं. वे अपने शहर-गांवों में या बाहर निकल कर आसानी से मर्जी और पसंद के काम कर र ही हैं.
इसका श्रेय शैक्षिक विस्तार, डेटिंग ऐप जैसे तकनीकी परिवर्तन और विदेशी प्रभाव को दिया जाता है. कई लोग इसे सामाजिक-आर्थिक बदलाव की एक बड़ी प्रक्रिया के अनिवार्य हिस्से के तौर पर भी देखते हैं, लेकिन स्थानीय मान्यताओं और संस्कृतियों की कई परतें हैं जिनसे समाज और परिवार के बुजुर्ग अब तक बाहर नहीं निकल सके हैं. ऐसे में लड़कियों को ये आजादी जोखिमों के साथ मिल रही है.
भारत का समाज ‘भागकर शादी करने’ का नाम देता है. कैटरीना ने अपने परिवार और समुदाय के दिए गए मानदंडों और नियमों का पालन नहीं किया, इसलिए उन्होंने परिवार से संबंध खो दिए और इसके साथ ही अधिकार भी खो दिये.
स्वीडन की लुंड यूनिवर्सिटी की काइसा नाइलिन ने एक थीसीस स्टडी में बेंगलुरु की दस महिलाओं के प्रेम-विवाह के अनुभवों और उनके असर का जिक्र किया है. यह कहानी उसी का एक हिस्सा है. दरअसल, कैटरीना का यह अनुभव सामाजिक बहिष्कार और अलगाव का अनुभव है, जिससे अक्सर अपनी पसंद का पार्टनर चुनने पर लड़कियों को गुजरना पड़ता है. यह खुलेआम भारतीय समाज में दिखता है.
प्रेम विवाह को सफल बनाने का दबाव
अलग धर्म या अलग जाति में या अपनी मर्जी से शादी करने वाली महिलाओं के लिए घरेलू दुर्व्यवहार, हिंसा के खिलाफ मदद लेना मुश्किल होता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में, परिवार उन्हें ‘अस्वीकार’ कर देता है. आगे चलकर अगर पति या पार्टनर अच्छा बर्ताव करने वाला इंसान नहीं निकला तो लड़कियों में अपराधबोध पैदा होता है कि वे एक गलत कदम उठा चुकी हैं.
वे डर और संकोच के मारे अपने साथी के बारे में शिकायत नहीं करतीं क्योंकि ये उनके परिवार की ‘चेतावनी’ और पूर्वाग्रहों की पुष्टि करेगा. लड़कियां इस दबाव से गुजरती हैं कि उन्हें किसी तरह रिश्ते को ठीक बनाए रखना है क्योंकि ”…हमने तो पहले ही कहा था कि ऐसा होगा.” कहने वाले परिवार और रिश्तेदारों को नकार कर उन्होंने अपने दम पर एक मुश्किल फैसला लेने का साहस किया होता है.
- आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में गूंजे ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे: 400 से अधिक शिक्षक-छात्रों ने निकाली भव्य तिरंगा रैली - August 11, 2026
- आगरा में क्रिप्टो निवेश के नाम पर साइबर ठगी: बुजुर्ग से ठगे गए लाखों रुपये, मौत के बाद बेटे ने बैंक खातों की जांच की तो हुआ खुलासा - August 11, 2026
- आगरा में साइबर ठगों का नया पैंतरा: युवती की फोटो लगाकर इंस्टाग्राम पर बनाई फर्जी आईडी, आपत्तिजनक वीडियो वायरल करने की धमकी देकर मांगे रुपय - August 11, 2026