नई दिल्ली। सीमाओं पर बढ़े तनाव, रिश्तों में जमी बर्फ और हालिया सैन्य टकराव के बावजूद भारत और पाकिस्तान ने परमाणु सुरक्षा से जुड़े अपने लंबे समय से चले आ रहे दायित्व को एक बार फिर निभाया है। वर्ष 2026 की पहली सुबह, गुरुवार को दोनों देशों ने अपने-अपने परमाणु ठिकानों और संबंधित सुविधाओं की सूची का औपचारिक रूप से आदान-प्रदान किया।
यह कदम ऐसे वक्त में उठाया गया है, जब मई में चार दिन तक चले सैन्य संघर्ष के बाद द्विपक्षीय रिश्ते बेहद निचले स्तर पर हैं और आपसी भरोसा लगभग खत्म माना जा रहा है। इसके बावजूद इस संवेदनशील प्रक्रिया का पालन यह संकेत देता है कि परमाणु टकराव की सीमा आज भी दोनों देशों के लिए एक स्पष्ट ‘रेड लाइन’ बनी हुई है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह आदान-प्रदान परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले की मनाही से जुड़े द्विपक्षीय समझौते के तहत किया गया। नई दिल्ली और इस्लामाबाद में कूटनीतिक माध्यमों से एक साथ यह प्रक्रिया पूरी हुई। मंत्रालय ने कहा कि समझौते के दायरे में आने वाले सभी परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की सूची दोनों देशों ने साझा की है।
गौरतलब है कि यह समझौता 31 दिसंबर 1988 को हस्ताक्षरित हुआ था और 27 जनवरी 1991 से प्रभावी है। इसके तहत हर साल 1 जनवरी को दोनों देशों को एक-दूसरे को अपने परमाणु ठिकानों की जानकारी देना अनिवार्य है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, यह इस तरह का 35वां लगातार आदान-प्रदान है, जिसकी शुरुआत 1 जनवरी 1992 से हुई थी।
भले ही यह प्रक्रिया तकनीकी और औपचारिक मानी जाती हो, लेकिन इसका रणनीतिक महत्व कम नहीं है। भारत का रुख स्पष्ट है कि वह किसी भी परिस्थिति में परमाणु गैर-जिम्मेदारी का हिस्सा नहीं बनेगा। वहीं पाकिस्तान भी जानता है कि न्यूक्लियर मोर्चे पर किसी भी तरह की चूक की कोई गुंजाइश नहीं है। सीमाओं पर तनाव, आतंकवाद और सैन्य टकराव अपनी जगह हैं, लेकिन परमाणु तबाही की ओर बढ़ने से पहले दोनों देशों की मजबूरी इस वार्षिक आदान-प्रदान में साफ दिखाई देती है। यही संतुलन अब भी दक्षिण एशिया को बड़े विनाश से दूर रखे हुए है।
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