उर्दू के विद्वान और साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर गोपी चंद नारंग का बुधवार को अमेरिका में निधन हो गया.
वह 91 साल थे. वह अपने बेटे डॉ. तरुण नारंग के साथ नॉर्थ कैरोलाइना के शार्लेट में रह रहे थे. प्रोफ़ेसर नारंग ने लगभग 60 से अधिक किताबें लिखीं.
उनकी रचनाएं उर्दू ग़ज़ल और हिंदुस्तानी तहज़ीब को ख़ूबसूरती से पेश करती हैं.
आमतौर पर ग़ज़ल को सिर्फ़ प्रेम की अभिव्यक्ति के तौर पर देखा जाता है लेकिन उन्होंने इसे कई रूपों में पेश किया.
प्रोफ़ेसर नारंग का पूरा जीवन उर्दू को रूढ़िवादिता और सांप्रदायिकता के दायरे से आज़ाद रखने की कोशिश में गुज़रा. यह उनकी ख़वाहिश थी कि भाषा को नदी की तरह होना चाहिए, जिसे नएपन का समावेश करते रहना चाहिए.
प्रोफ़ेसर गोपी चंद नारंग का जन्म 11 फ़रवरी 1931 को दुक्की, बलूचिस्तान में हुआ था.
साल 1954 मे उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से उर्दू में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की और 1958 में अपनी पीएचडी पूरी की. शुरुआत सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली में उर्दू साहित्य पढ़ाने के साथ हुई लेकिन बाद में वह दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू डिपार्टमेंट में आ गए और रीडर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं.
इसके अलावा उन्होंने विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी, मिनेसोटा यूनिवर्सिटी और ओस्लो यूनिवर्सिटी में भी अपनी सेवाएं दीं.
-एजेंसियां
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