खारी नदी के किनारे जागती विरासत: सिकरवारों की कुलदेवी, इतिहास और आस्था का अद्भुत संगम
इतिहास की पगडंडी पर एक पुनः यात्रा
आज खारी नदी के तट पर स्थित सिकरवार राजपूतों की कुलदेवी के मंदिर और सांथा गांव में आयोजित मेले का भ्रमण, राजकिशोर शर्मा राजे के साथ हुआ। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह अतीत की उन परतों को फिर से छूने का अवसर बनी, जिन्हें वर्षों पहले 2013 में मैंने यानी रमेश चंद्र अग्रवाल ने खंगाला था। उस समय खारी नदी पर स्थित तेरह मोरी, कोरई गांव के गूंग महल और आसपास के ऐतिहासिक अवशेषों का गहन निरीक्षण किया गया था।
खंडहरों में छिपी सभ्यता की कहानी
पूर्व के अध्ययन में सांथा गांव के महादेव मंदिर, कष्टहर मंदिर और गिरजावली मंदिर के टूटे अवशेषों का निरीक्षण किया गया था। इन खंडहरों की वास्तुकला और शिल्पकला उस युग की समृद्धि और स्थापत्य कौशल की गवाही देते हैं। यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र कभी धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा होगा।
पार्श्वनाथ से कुलदेवी तक: बदलती आस्था की धारा
जिस मंदिर में आज सिकरवारों की कुलदेवी विराजमान हैं, वही स्थान कभी भगवान पार्श्वनाथ के रूप में विख्यात था। उस समय मलबे में लगभग 7-8 फीट ऊंची एक प्रतिमा मिली थी, जिसके सिर पर पांच फन थे और नीचे सर्प की कुंडली बनी हुई थी। टूटी हुई भुजाएं और क्षतिग्रस्त फन इस बात का संकेत देते हैं कि समय और आक्रमणों ने इस धरोहर को गहरी चोट पहुंचाई है।
वास्तुकला और सुरक्षा का अद्भुत संतुलन
मंदिर की लंबाई लगभग 30-35 फीट और चौड़ाई 20-25 फीट थी, जिसका मुख पूर्व दिशा की ओर था। बाढ़ से बचाव के लिए बेलनाकार संरचनाएं बनाई गई थीं, जो उस समय की उन्नत इंजीनियरिंग का प्रमाण हैं। नदी के किनारे कुआं, दूसरी ओर खंडहरनुमा कमरे और जल प्रवाह को नियंत्रित करने वाली दीवार आज भी उस युग की सोच और दूरदर्शिता को दर्शाती हैं।
आज का भव्य स्वरूप: आस्था का जीवंत केंद्र
वर्तमान में मंदिर का स्वरूप अत्यंत भव्य और आकर्षक है। कुलदेवी की प्रतिमा उत्तर दिशा की ओर स्थापित है और प्रवेश करते ही गरुड़ भगवान की भव्य मूर्ति दिखाई देती है। हवन कुंड में आहुति देते श्रद्धालु और दूर-दूर से आए भक्तों की भीड़ इस स्थान को जीवंत बना देती है। मेले का वातावरण उल्लास और श्रद्धा से परिपूर्ण था।
जनश्रुतियां और सिकरवार वंश की जड़ें
लोककथाओं के अनुसार, एक समय सिकरवार राजा की गर्भवती पत्नी को यहां एक संत ने आश्रय दिया और उसे बेटी समान मानकर संरक्षण दिया। इसी घटना को सिकरवार वंश के विस्तार का आधार माना जाता है। यह कथा इस स्थान की आध्यात्मिक और सामाजिक महत्ता को और गहरा बनाती है।
बाबर का आक्रमण और टूटी विरासत
प्राचीन पार्श्वनाथ प्रतिमा, जिसे लगभग 8-10 फीट ऊंचा बताया गया है, को बाबर ने खानवा की लड़ाई के समय क्षतिग्रस्त किया था। आज वह प्रतिमा मंदिर से हटाकर एक ओर स्थापित कर दी गई है, लेकिन उसकी पूजा अब भी विधिवत होती है। यह दृश्य इतिहास की क्रूरता और आस्था की दृढ़ता का अनोखा संगम प्रस्तुत करता है।
पुनरुद्धार और सामूहिक प्रयास की मिसाल
मंदिर का वर्तमान भव्य स्वरूप सिकरवार राजपूत समाज के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। लगभग 20-25 फीट ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर आज आस्था, एकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है।
जन्मभूमि से जुड़ी भावनाएं
मेरे लिए यह स्थान केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि उनकी जन्मभूमि से जुड़ी गहरी भावनाओं का केंद्र है। यहां की मिट्टी, यहां की कहानियां और यहां की विरासत उनके भीतर गर्व और आत्मीयता का भाव जगाती हैं।
संपादकीय: इतिहास केवल अतीत नहीं, भविष्य की नींव है
खारी नदी के किनारे स्थित यह धरोहर हमें एक कड़वा लेकिन जरूरी सच दिखाती है—अगर हम अपने इतिहास को नहीं संभालेंगे, तो वह धीरे-धीरे मिटता चला जाएगा। कभी पार्श्वनाथ का भव्य मंदिर, फिर खंडहर, और अब कुलदेवी का पुनर्जीवित स्वरूप—यह पूरी यात्रा हमें बताती है कि समय सब कुछ बदल देता है, लेकिन जो समाज जागरूक होता है, वह अपनी पहचान बचा लेता है।
आज जरूरत है कि ऐसे स्थलों को केवल धार्मिक केंद्र न मानकर, उन्हें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में संरक्षित किया जाए। पुरातत्व विभाग, स्थानीय प्रशासन और समाज को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। क्योंकि जब तक हम अपनी जड़ों को नहीं पहचानेंगे, तब तक विकास की कोई भी इमारत अधूरी रहेगी।
सच कहें तो यह केवल एक मंदिर की कहानी नहीं है—यह हमारी पहचान, हमारी अस्मिता और हमारे गौरव की कहानी है। और अगर यह विरासत जिंदा है, तो समझिए हमारी आत्मा अभी भी सांस ले रही है।
डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक
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