बैंक खाते पूरी तरह फ्रीज करना मनमाना और मौलिक अधिकारों का हनन: दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने बैंक खातों पर रोक लगाने को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि खाताधारक न आरोपी है और न जांच के दायरे में संदिग्ध, तो उसके खाते के लेन-देन पर पूरी या असंगत रोक लगाना मनमाना कदम माना जाएगा। अदालत ने कहा कि ऐसा करना आजीविका और व्यवसाय की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।

“निर्दोष इकाइयों का कारोबार प्रभावित होता है”

जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने कहा कि बिना पर्याप्त आधार खातों को फ्रीज करना किसी निर्दोष इकाई के रोजमर्रा के कामकाज को ठप कर सकता है। इससे उसकी व्यावसायिक साख को नुकसान पहुंचता है और आर्थिक दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। यह टिप्पणी अदालत ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान की।

केंद्र और आई4सी को आदेश वापस लेने की मांग

याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया था कि केंद्र सरकार और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केन्द्र (आई4सी) को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और एचडीएफसी बैंक को दिए गए खातों पर रोक संबंधी निर्देश वापस लेने को कहा जाए।

साइबर शिकायत के बाद लगी थी रोक

मामले के अनुसार, गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाला आई4सी साइबर अपराध से जुड़े मामलों की नोडल एजेंसी है। एक ग्राहक की साइबर धोखाधड़ी शिकायत के बाद याचिकाकर्ता के खातों पर रोक लगा दी गई थी। पुलिस के निर्देशों के आधार पर मार्च 2025 तक करीब 80 लाख रुपये फ्रीज कर दिए गए।

अदालत ने हटाने के दिए निर्देश

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ न कोई शिकायत है और न ही किसी तरह की मिलीभगत के प्रमाण सामने आए हैं। ऐसे में आई4सी को तुरंत दोनों बैंकों को खातों से रोक हटाने का निर्देश देने को कहा गया।

पीठ ने यह भी माना कि खातों पर रोक से याचिकाकर्ता अपने कर्मचारियों को वेतन देने और रोजमर्रा के कारोबारी खर्च पूरे करने में असमर्थ हो गया था। अदालत ने कहा कि मशीनी तरीके से की गई ऐसी कार्रवाई से व्यापार ठप हो सकता है और यह अधिकारों का उल्लंघन है।

Dr. Bhanu Pratap Singh