खामोशी का असर: परिवार और समाज पर संवादहीनता का बोझ

डॉ सत्यवान सौरभ आज के व्यस्त और डिजिटल जीवन में संवादहीनता परिवार और समाज की बड़ी चुनौती बन गई है। बातचीत की कमी भावनात्मक दूरी, गलतफहमियाँ और मानसिक तनाव बढ़ाती है। परिवार में बच्चे और बड़े एक-दूसरे की भावनाओं को साझा नहीं कर पाते, जबकि समाज में सहयोग और सामूहिक प्रयास कमजोर पड़ते हैं। इसका […]

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दीपोत्सव 2025: इस तरह के विश्व रिकॉर्ड्स का क्या किया जाए?

एड.संजय पांडे(वकील, मुंबई उच्च न्यायालय) उत्तर प्रदेश में दीपोत्सव की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी, जब केवल 1.71 लाख दीये जलाए गए थे। तब से हर वर्ष यह आयोजन और भव्य होता गया है, और 2025 में इसकी संख्या बढ़कर 26.17 लाख तक पहुंच गई। अयोध्या में इस वर्ष दीपोत्सव 2025 में राम की […]

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समाज सेवा विशेष: कुर्सी नहीं, भरोसे की राजनीति… रमेश वर्मा का सफ़र

डॉ सत्यवान सौरभ भिवानी के गाँव बड़वा में जन्में रमेश वर्मा की राजनीतिक यात्रा एक ऐसे जननेता की कहानी है जिसने सत्ता नहीं, सेवा को साधन बनाया। चार दशक से अधिक समय में उन्होंने पंचायत से लेकर विधानसभा तक अपनी पहचान ईमानदारी, पारदर्शिता और जनसेवा से बनाई। गांवों में विकास, महिलाओं का सशक्तिकरण और युवाओं […]

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गोवर्धन पूजा: भक्ति सिर्फ़ तस्वीर नहीं, धरती और जीवन के प्रति कृतज्ञता का संदेश

डॉ सत्यवान सौरभ गोवर्धन पूजा केवल भगवान कृष्ण का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, गाय और धरती के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, संवेदना में है। आज जब पूजा इंस्टाग्राम की तस्वीर बन चुकी है और गोबर की जगह प्लास्टिक ने ले ली है, तब ज़रूरत […]

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करवा चौथ: परंपरा का पालन या रिश्तों की नयी व्याख्या?

प्रेम, आस्था और समानता के बीच झूलता एक पर्व — जहाँ परंपरा भी है, और बदलाव की दस्तक भी। प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार करवा चौथ भारतीय संस्कृति का एक लोकप्रिय पर्व है, जिसमें विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। हालांकि इसकी परंपरा प्रेम और समर्पण से […]

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बढ़ती छात्र आत्महत्याएँ: कानून हैं, लेकिन संवेदना कहाँ है?

डॉ सत्यवान सौरभ भारत में बढ़ती छात्र आत्महत्याएँ एक गहरी सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य संकट का संकेत हैं। मानसिक स्वास्थ्य कानून (2017) और आत्महत्या रोकथाम नीति (2021) ने क़ानूनी ढाँचा तो दिया, पर उसका असर सीमित रहा। जागरूकता की कमी, काउंसलिंग ढाँचे का अभाव और अभिभावकों की अपेक्षाएँ छात्रों को अवसाद की ओर धकेल रही […]

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सोशल मीडिया का मायाजाल: डोपामाइन, आत्म-चेतना और FOMO की बढ़ती जकड़न, जानिए क्या करें

  डॉ प्रमोद कुमार 21वीं सदी में मानव जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा डिजिटल तकनीक और इंटरनेट से संचालित हो रहा है। आज के दौर में संचार, शिक्षा, व्यापार, मनोरंजन और सामाजिक संबंधों का सबसे प्रमुख माध्यम सोशल मीडिया बन चुका है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर (अब एक्स), टिकटॉक, स्नैपचैट और यूट्यूब जैसी एप्लिकेशन न केवल […]

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तीन: बचपन की गलियों से गुजरती एक किताब

अमित श्रीवास्तव की ‘तीन’ महज़ एक किताब नहीं, बल्कि बीते समय का एक दरवाज़ा है। यह वह दरवाज़ा है, जिसे खोलते ही पाठक कस्बाई जीवन की गलियों में लौट जाते हैं। वह दौर जब मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन दोस्तों के साथ खेलना था, जब घर की रसोई की खुशबू ही सबसे बड़ी दावत होती […]

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पूर्वाग्रह से परे: दिव्यांगजन के अधिकारों पर नई बहस

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार भारत में करोड़ों दिव्यांगजन आज भी शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य और सार्वजनिक जीवन में हाशिए पर हैं। संवैधानिक अधिकारों और 2016 के दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के बावजूद सामाजिक पूर्वाग्रह, ढांचागत बाधाएँ और मीडिया में विकृत छवि उनकी गरिमा को चोट पहुँचाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि […]

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संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक: क्यों माँ बन रही है प्रसूता की पहली मददगार”

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार  अध्ययन बताते हैं कि प्रसव के बाद महिलाओं की देखभाल करने में सास की तुलना में उनकी अपनी माँ कहीं अधिक सक्रिय और संवेदनशील रहती हैं। लगभग 70 प्रतिशत प्रसूताओं को नानी से बेहतर सहयोग मिला, जबकि मात्र 16 प्रतिशत को सास से सहायता मिली। यह बदलाव संयुक्त […]

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