दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पुनर्विवाह के बाद भी विधवा को मिलेगी पारिवारिक पेंशन, माता-पिता का दावा खारिज

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नई दिल्ली। पारिवारिक पेंशन को लेकर लंबे समय से उठते सवालों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम और स्पष्ट फैसला दिया है। अदालत ने कहा है कि केंद्र सरकार के मृतक कर्मचारी की निःसंतान विधवा, यदि वह पुनर्विवाह कर ले, तब भी पारिवारिक पेंशन की हकदार बनी रहेगी, बशर्ते उसके पास स्वतंत्र आय का कोई स्थायी स्रोत न हो।

यह फैसला “दिल्ली हाई कोर्ट” की पीठ ने दिया, जिसमें जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन शामिल थे। कोर्ट ने इसे न तो मनमाना माना और न ही भेदभावपूर्ण, बल्कि इसे एक सामाजिक कल्याण नीति बताया, जिसका मकसद विधवाओं को आर्थिक सुरक्षा देना और उनके पुनर्वास को प्रोत्साहित करना है।

मामला क्या था?

मामला केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक जवान से जुड़ा था, जिनकी ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी को नियमों के तहत पारिवारिक पेंशन मिल रही थी। बाद में महिला ने पुनर्विवाह कर लिया। इसके बाद मृतक जवान के माता-पिता ने दावा किया कि अब विधवा पेंशन की पात्र नहीं रही, इसलिए पेंशन उन्हें मिलनी चाहिए।

माता-पिता का तर्क था कि पुनर्विवाह के बाद वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाता है और ऐसे में विधवा को पेंशन मिलना अनुचित है। उन्होंने केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के नियम 54 और 2009 के कार्यालय ज्ञापन को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी।

कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने माता-पिता की सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि:

पारिवारिक पेंशन कोई विरासत या संपत्ति नहीं है, बल्कि यह एक वैधानिक सामाजिक सुरक्षा लाभ है।

नियम 54 में पेंशन के हकदारों का स्पष्ट प्राथमिकता क्रम तय है।

यदि मृतक कर्मचारी की विधवा जीवित है और नियमों के अनुसार पात्र है, तो माता-पिता को पारिवारिक पेंशन नहीं दी जा सकती।

पुनर्विवाह अपने आप में पेंशन से वंचित करने का आधार नहीं है, खासकर तब जब विधवा के पास स्वतंत्र आय न हो।

कोर्ट ने यह भी माना कि सरकार की नीति केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य विधवाओं को सामाजिक असुरक्षा से बाहर निकालना और उन्हें नया जीवन शुरू करने के लिए प्रेरित करना है।

माता-पिता को पेंशन कब मिलेगी?

अदालत ने स्पष्ट किया कि मृतक कर्मचारी के माता-पिता तभी पारिवारिक पेंशन के पात्र होते हैं, जब वह न तो विधवा छोड़कर गया हो और न ही कोई संतान। यदि विधवा मौजूद है और पात्र है, तो माता-पिता को पेंशन न मिलना संविधान के खिलाफ नहीं माना जाएगा।

क्यों अहम है यह फैसला?

कोर्ट ने यह भी कहा कि सशस्त्र और अर्धसैनिक बलों के जवान देश के लिए बड़ा बलिदान देते हैं। ऐसे में यह राज्य की जिम्मेदारी है कि उनके आश्रितों को आर्थिक असुरक्षा में न छोड़ा जाए। पारिवारिक पेंशन का उद्देश्य तुरंत और लगातार आर्थिक सहारा देना है, न कि किसी संपत्ति का अधिकार तय करना।

इस फैसले से साफ हो गया है कि पुनर्विवाह के बाद भी निःसंतान विधवा, यदि आर्थिक रूप से निर्भर है, तो पारिवारिक पेंशन की पूरी हकदार रहेगी।

Dr. Bhanu Pratap Singh