जयपुर के कलाकार काफी दिन पहले से होली के पर्व को गुलाल गोटा के जरिये रंगीन बनाने में जुट जाते हैं। ये गुलाल गोटे भारत की विरासत रही गंगा जमुनी तहजीब की निशानी हैं।
रंगों के पर्व होली के नजदीक आते ही बाजारों में दुकानें तरह-तरह की पिचकारियों, गुलाल, रंगों से सजी दिखाई देती हैं। लाख की चूड़ियों के लिये देश विदेश में अपनी पहचान बनाने वाले गुलाबी नगर के परकोटे के अंदर स्थित मणिहारों के रास्ते में इन दिनों दुकानें गुलाल गोटा से सजी हुई हैं।
होली के दिनों में मणिहारों के रास्ते पर सजी दुकानों में इको फ्रेंडली हर्बल रंगों से तैयार गुलाल गोटों की बिक्री जोर पकड़ रही है। इनका ऑनलाइन बाजार भी पीछे नहीं है। 15 से 20 रुपये के बीच बिकने वाला गुलाल गोटा आम लोगों के साथ साथ देशी विदेशी पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है।
गुलाल गोटे की पारम्परिक कला को मुस्लिम परिवारों की युवा पीढ़ी भी आगे बढ़ा रही है। जयपुर के राजशाही के ज़माने में राजा इन्हीं गुलाल गोटे से प्रजा के साथ होली खेलते थे। युवा कलाकार मोहम्मद जुनैद ने बताया कि उनकी पांच पीढियां यह काम करती रही हैं। एक गुलाल गोटे का वज़न पाँच ग्राम से ज़्यादा नहीं होता।
इसे बनाने के लिए लाख को गर्म कर, फिर फूंकनी की मदद से इसे फुलाया जाता है। फिर उसे गुलाल भरकर बंद कर देते हैं। इसे जैसे ही किसी पर फेंका जाता है, लाख की पतली परत टूट जाती है और बिखरते गुलाल से आदमी सराबोर हो जाता है। उन्होंने बताया कि इसमें इको फ्रैंडली आरारोट के रंग भरे जाते हैं जिससे किसी को कोई नुक़सान नहीं पहुँचता।
एक अन्य कलाकार आवाज़ मोहम्मद ने बताया कि कभी उनके पूर्वज यह काम आमेर में किया करते थे। ‘जयपुर आने के बाद हमारी सात पीढ़ियां मणिहारों के रास्ते में लाख की चूड़ियों सहित गुलाल गोटा बनाने के काम में लगी हैं।’ उनकी पुत्री गुलरुख सुल्ताना ने बताया कि होली में गुलाल गोटा की इतनी ज्यादा मांग होती है कि हम एक महीने पहले से इस काम में लग जाते हैं।
-एजेंसियां
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