डॉ. भानु प्रताप सिंह
हालांकि वे अंगूठा छाप थे लेकिन पैसे में सबके बाप थे। पार्टी ने गले लगाया, विधायक बनाया। पूरे पांच साल आनंद लिया, पार्टी के लिए कुछ न किया। दूसरी दफा पार्टी ने टिकट न थमाया तो भैया मेरा पार्टी छोड़ आया। हमने नैक छेड़ा तो कर दिया बखेड़ा। वे बात की शुरुआत गालियों से करते हैं लेकिन हम उन्हें लिखने से डरते हैं। बात शुरू होते ही पुरानी पार्टी को गरियाने लगे, सवालों के जबाव कुछ इस तरह बताने लगे-
सवाल: पुरानी पार्टी में क्या कमी आ गई, नई पार्टी कैसे भा गई?
जवाब: का बताऊं भाईसाहब, आप तो सब जानते हैं, फिर भी मुझे पर ही सवाल तानते हैं। तुम्हें तो पतौ ही है कि पार्टी के लिए मैंने दिन रात एक कर दिया, बदले में कुछ न लिया। एक टिकट क्या मांग लिया, सबने मुंह फुला लिया। अब आप ही बताओ कि ऐसी पार्टी के साथ कैसे रहता, अपने समाज का अपमान कैसे सहता।
सवाल: पुरानी पार्टी ने तो आपको विधायकी दिलाई, इसके बाद भी इतनी बेवफाई?
जवाब: कर दी न बच्चों जैसी बात, बताता हूं आपको सच्ची बात। विधायकी क्या फोकट में दी थी, हर किसी ने रकम ली थी। सबके नाम बताऊंगा तो भूचाल आ जाएगा, कोई मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा। एक नेताजी तो स्वर्ग सिधार गए हैं, मेरा लाखों रुपया मार गए हैं। कुछ करते हैं नहीं भांजी के मामा, बातें बड़ी-बड़ी करते हैंगे भांजी के मामा। वैसे भी पार्टी में मेरा दम घुट रहा था, इसलिए निकल लिया।
सवाल: तो इसका मतलब है कि पुरानी पार्टी कार्बनडाइऑक्साइड का चैम्बर है?
जवाब: फिर वही मजाक, क्या पूछ रहे हैं आप। पुरानी पार्टी में कई खसम हैं, सबके सब एटम बम हैं। एक को मनाओ तो दूसरा रुठ जाता है, दूसरे को पकड़ो तो तीसरा हाथ छूट जाता है। कभी सहयोग निधि के नाम पर चढ़ावा चढ़ाओ तो कभी गुरु दक्षिणा में मोटा लिफाफा लाओ। किस-किस को मनाएं, किस-किस को गिफ्ट पहुंचाएं। इसलिए झंझट ही खत्म कर दिया, पार्टी नेताओं को ही झंड कर दिया।
सवाल: नई पार्टी के बारे में क्या कहेंगे, क्या हमेशा इसी में रहेंगे?
जवाब: पुरानी पार्टी में तो मैं तन से था, नई पार्टी में तो मैं शुरू से ही मन से था। नई पार्टी में सिर्फ एक की सेवा करनी है, बदले में मेवा ही मेवा मिलनी है। नई पार्टी मेरी जान है, मेरी शान है, मेरी आन है, मेरे अरमानों का निशान है। सिर्फ एक नेताजी को चढ़ावा चढ़ाऊंगा और राज्यसभा में भी पहुंच जाऊंगा।
राजनीति का अजब फलसफा है, कविवर गोपालदास नीरज ने ठीक ही कहा है-
राजनीति के खेल ये समझ सका है कौन।
बहरों को भी बँट रहे अब मोबाइल फोन।।
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डॉ. भानु प्रताप सिंह, संपादक
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