नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने देश में युवाओं के आंदोलन और मीडिया की बदलती भूमिका को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी पोस्ट के जरिए अखिलेश यादव ने मुख्यधारा के मीडिया पर निशाना साधते हुए कहा कि मीडिया को अब अपनी कार्यशैली बदलकर ‘मेनस्ट्रीट मीडिया’ बनना होगा, क्योंकि जनता अब दिखावे वाले ‘कॉस्मेटिक जर्नलिज्म’ से ऊब चुकी है।
इस आंदोलन ने बड़े-बड़ों की पोजिशन रोटेट कर दी है, मीडिया भी इसका अपवाद नहीं है। आज संकट सिर्फ़ ‘राष्ट्रीय सरकार’ के लिए ही नहीं, तथाकथित ‘राष्ट्रीय मीडिया’ के लिए भी बराबर का ही है। जवाबदेही का सवाल केवल किसी एक के लिए नहीं है।
जब कोई ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा दे रहा था, तो नेशनल मीडिया के लोग समझ ही नहीं पाए कि वे जिस बात का प्रचार कर रहे हैं, वह केवल किसी प्रोडक्ट तक सीमित नहीं रहेगी। अगर राष्ट्रीय मीडिया अपनी चकाचौंध और पैकेजिंग में न्यूज़ को प्रोडक्ट बनाकर पेश करेगा, तो फिर आम लोग भी लोकल और स्थानीय चैनलों पर ज़्यादा भरोसा करेंगे, क्योंकि वे उनकी पहुँच में हैं और उनमें उन्हें अपनी भाषा-बोली का अपनापन भी दिखता है, साथ ही उन स्थानीय पत्रकारों के दिनभर के दौड़ते-भागते रहने के संघर्ष में सच्चाई भी दिखती है।
जनहित के लिए समर्पित ’आकार में छोटे लेकिन विचार में बड़े’, ये सभी सच्चे न्यूज़ व व्यूज़ चैनल्स या यूट्यूबर जर्नलिस्ट-पैनलिस्ट केवल दिखावटी औपचारिकता पूरी नहीं करते हैं, बल्कि जनमानस के बीच की बातें करते हैं। ये ऊपरी-ऊपरी औपचारिक कॉस्मेटिक जर्नलिज्म नहीं करते हैं; बल्कि जनता के मसलों, मुद्दों और जन सरोकार से जुड़े सच्चे विषय उठाते हैं। ये सरकार के सहयोग से कॉरपोरेट मीडिया की तरह चमचमाते नहीं हैं बल्कि जनता के ऐतबार से चलते हैं। ये एक हाथ से माइक या मोबाइल पकड़ते हैं और दूसरे से अपने गमछे से पसीना पोंछते हैं।
ज़मीन से जुड़ी यह ‘माटी पत्रकारिता’ या कहें जमीनी पत्रकारिता ‘Grounded Journalism’ ही सच्चे जर्नलिज़्म का भविष्य है। उन्होंने कहा कि अब जनता ‘नाटकीय निरर्थक विवाद’ नहीं, ‘वास्तविक सार्थक संवाद’ देखना चाहती है। अब ‘जिसका दाना, उसका गाना’ वाला चारण युग अपने अंतिम पड़ाव में है।
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