आगरा: सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बनकर मथुरा का एक मुस्लिम परिवार पांच पीढ़ियों से रामलीला का हिस्सा है। यह परिवार हर साल दशहरे के मौके पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशालकाय पुतले तैयार करता है। परिवार के मुखिया जफर अली और उनके भाई आमिर खान का कहना है कि धर्म से बड़ा इंसान का काम होता है, और उनके लिए रामलीला सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि उनकी रोजी-रोटी का जरिया है।
5 पीढ़ियों से जारी परंपरा
62 वर्षीय जफर अली और उनके परिवार ने करीब डेढ़ महीने पहले से ही पुतले बनाने का काम शुरू कर दिया था। उनके बुजुर्ग भी इस काम में माहिर थे और अब यह परंपरा उनके परिवार की पहचान बन चुकी है। जफर अली कहते हैं, “रामलीला के हर मंचन के बारे में मुझे मुंह जुबानी याद है। कब कौन सा दृश्य होगा, कौन सी घटना का मंचन होगा, सब पता है।” उनका कहना है कि उनका परिवार पिछले 40 सालों से इस ऐतिहासिक रामलीला का हिस्सा है और यह काम उनके लिए महज़ धर्म से नहीं जुड़ा, बल्कि एक कारीगरी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही है।
राम सबके, कोई भेदभाव नहीं
जफर अली के साथी कारीगर आमिर का कहना है कि उनके लिए रामलीला का काम कोई धर्म का मामला नहीं है। उनके मुताबिक, “हमारे लिए हिंदू और मुसलमान एक ही हैं। समाज को धर्म के नाम पर बांटने का काम कुछ राजनीतिक लोग कर रहे हैं। हम पुतले बनाते हैं, और हमें इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं दिखता।” आमिर और जफर अली का परिवार हर साल रामलीला के लिए रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद और सोने की लंका के अलावा अशोक वाटिका, घोड़े, हाथी और पक्षियों के पुतले भी तैयार करता है।
हर साल बढ़ रहा रावण का पुतला
इस साल भी रावण के पुतले का आकार पिछले साल से बड़ा होने वाला है। पिछले साल 120 फुट ऊंचा रावण का पुतला था, जबकि इस बार इसे 125 फुट का बनाया जा रहा है। कुंभकर्ण का पुतला 100 फुट का और मेघनाद का पुतला 90 फुट का होगा। जब रावण के पुतले का दहन होगा, तो उसकी आंखें झपकेंगी और वह ज़ोर से हंसेगा। यह नज़ारा देखने के लिए हजारों लोग जुटते हैं और जफर अली और उनकी टीम इस काम को बखूबी अंजाम देती है।
“धर्म से पहले है रोटी”
जफर अली का कहना है, “जो लोग धर्म के नाम पर लड़ते हैं, उनके पेट भरे होते हैं। गरीब के लिए धर्म से बड़ा उसका काम होता है। हमारे घर की रोजी-रोटी रामलीला से चलती है, इसलिए राम हमारे लिए सबसे बड़े हैं।” उनका यह भी कहना है कि मज़हब हमें इंसानियत से दूर नहीं कर सकता। यही वजह है कि उनका परिवार पीढ़ियों से रामलीला का हिस्सा है और वह इसे आगे भी जारी रखेंगे।
इस तरह, जफर अली और उनका परिवार सिर्फ पुतले नहीं बनाता, बल्कि इंसानियत और भाईचारे की मिसाल पेश करता है। उनके लिए रामलीला के पुतले धर्म से परे, सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक हैं।
-साभार सहित
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