आगरा: दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (DEI) की शोध छात्रा नम्रता गुप्ता द्वारा की गई आत्महत्या के मामले में पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, कई चौंकाने वाले और दुखद तथ्य सामने आ रहे हैं। प्रारंभिक जांच में यह स्पष्ट संकेत मिले हैं कि नम्रता लंबे समय से मानसिक तनाव और गहरे अवसाद (डिप्रेशन) से जूझ रही थीं। उनके शैक्षणिक करियर और शोध कार्य को लेकर बढ़ता दबाव उनकी इस मानसिक स्थिति का प्रमुख कारण माना जा रहा है।
पीएचडी का दबाव बना कारण
न्यू आगरा थाना पुलिस के अनुसार, जांच में अब तक किसी भी प्रकार के पारिवारिक विवाद या ससुराल पक्ष द्वारा उत्पीड़न का मामला सामने नहीं आया है। मायके और ससुराल, दोनों ही पक्षों ने स्पष्ट रूप से किसी भी विवाद से इनकार किया है। पुलिस का पूरा ध्यान अब नम्रता की मानसिक स्थिति और उन परिस्थितियों पर केंद्रित है, जिन्होंने उन्हें आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर किया। पुलिस को जानकारी मिली है कि पीएचडी का कार्य उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रहा था, जिसे लेकर वह अक्सर हताशा और निराशा भरी बातें किया करती थीं।
सल्फास की गोलियों का ‘खतरनाक सच’
जांच में सबसे बड़ा और अहम खुलासा सल्फास की गोलियों को लेकर हुआ है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, नम्रता ने कुछ समय पहले ही ऑनलाइन सल्फास मंगाई थी। जब परिवार ने गोलियां देखीं, तो उन्होंने इसे ‘गेहूं में रखने’ का बहाना बनाकर टाल दिया था। हालांकि, पति विकास कुमार ने सावधानी बरतते हुए गोलियों के चार पत्ते फेंक दिए थे, लेकिन नम्रता ने चतुराई से दो पत्ते कहीं छिपा दिए थे। आशंका जताई जा रही है कि इन्हीं छिपाकर रखी गई गोलियों का इस्तेमाल उन्होंने अपनी जीवनलीला समाप्त करने के लिए किया।
पति से बार-बार कहती थीं- ‘जीने का मन नहीं करता’
थाना प्रभारी निशामक त्यागी ने बताया कि पूछताछ में यह बात भी निकलकर आई है कि नम्रता अक्सर अपने पति विकास कुमार से कहा करती थीं कि उनका अब जीने का मन नहीं करता। यह उनके गहरे अवसाद को दर्शाने के लिए काफी है। फिलहाल, पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद विसरा सुरक्षित रख लिया है। किसी भी पक्ष द्वारा कोई औपचारिक आरोप नहीं लगाया गया है, जिसके चलते पुलिस पूरी सावधानी से मामले की परिस्थितियों का विश्लेषण कर रही है।
मानसिक स्वास्थ्य का गंभीर प्रश्न
नम्रता की असामयिक मौत ने उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में काम कर रहे विद्यार्थियों के ‘मानसिक स्वास्थ्य’ को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छेड़ दी है। क्या शोध का बढ़ता दबाव और प्रतिस्पर्धा युवाओं के लिए जानलेवा साबित हो रही है? यह सवाल अब न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे शिक्षा जगत और समाज के सामने खड़ा है कि क्या हमारे संस्थानों में छात्रों को तनाव से बाहर निकालने के लिए प्रभावी काउंसिलिंग और संवेदनशीलता का अभाव है?
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