नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (6 फरवरी, 2026) को महिला अधिकारों की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर स्थापित किया है। एक नाबालिग की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध मां बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने नाबालिग को 30 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त (Medical Termination of Pregnancy) करने की विशेष अनुमति दे दी है।
प्रजनन स्वायत्तता सबसे ऊपर
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइंया की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मामला चाहे बलात्कार का हो या आपसी सहमति का, सबसे महत्वपूर्ण यह है कि गर्भवती महिला स्वयं क्या चाहती है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि नाबालिग की प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) और उसकी शारीरिक गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।
मानसिक आघात और सामाजिक कलंक का हवाला
नाबालिग के वकील ने दलील दी कि कम उम्र में बच्चे को जन्म देना और सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पीड़ित के लिए गहरा मानसिक आघात साबित होगा। कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि चूंकि वह खुद एक बच्ची है और इस अनचाहे गर्भ को ढोने के लिए तैयार नहीं है, इसलिए उस पर दबाव डालना अनुचित होगा।
अदालत के लिए भी कठिन था फैसला
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने अपनी संवेदनशीलता व्यक्त करते हुए कहा, “हमारे लिए भी ऐसा आदेश देना बेहद कठिन है, क्योंकि जन्म लेने वाला बच्चा भी एक जीवन है। लेकिन जब नाबालिग खुद ही इस गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती, तो हम उसे मजबूर नहीं कर सकते।”
जेजे हॉस्पिटल को जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई स्थित जेजे हॉस्पिटल को निर्देश दिया है कि वह पूरी चिकित्सकीय सावधानी और सुरक्षा के साथ गर्भपात की प्रक्रिया को संपन्न करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 24 हफ्ते की कानूनी सीमा के बाद भी विशेष परिस्थितियों में मां की मानसिक और शारीरिक स्थिति को देखते हुए यह राहत दी जा सकती है।
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