आगरा: ताजनगरी के नगर निगम परिसर में बीते दिनों हुआ विवाद अब आर-पार की जंग में बदल गया है। सदन की बैठक के दौरान ‘बाहरी’ बताए गए लोगों ने अब खुलकर मोर्चा खोल दिया है। इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब नगर निगम के केयरटेकर और सहायक अभियंता जीवेक ने हरीपर्वत थाने में दी गई अपनी तहरीर वापस ले ली। उन्होंने लिखित में स्वीकार किया कि उन्होंने यह तहरीर ‘उच्चाधिकारियों के दबाव’ में दी थी।
”हम बाहरी नहीं, भाजपा कार्यकर्ता और पार्षद प्रतिनिधि हैं”
गुरुवार को कथित तौर पर संदिग्ध बताए गए लोगों ने मीडिया के सामने आकर नगर निगम प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे कोई असामाजिक तत्व नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य संगठनों के सक्रिय कार्यकर्ता, पार्षदों के परिजन या उनके अधिकृत प्रतिनिधि हैं।
प्रमुख प्रतिक्रियाएं:
महापौर प्रतिनिधि हर्ष दिवाकर ने कहा “यह नगरायुक्त की सोची-समझी रणनीति है ताकि जनप्रतिनिधियों को कमजोर कर मनमानी की जा सके। सहयोगियों का साथ रहना स्वाभाविक है, इसे संदिग्ध बताना दुर्भावनापूर्ण है।”
पार्षद पुत्र व कांग्रेस नेता अपूर्व शर्मा ने कहा “नगर निगम में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई जा रही है। कर्मचारियों को जनप्रतिनिधियों के खिलाफ भड़काने की कोशिश हो रही है।”
भाजयुमो उपाध्यक्ष गोगा मौर्या ने कहा “हम 23 मार्च को निगम कार्यों के सिलसिले में वहां गए थे, हमें बाहरी बताना गलत है।”
तहरीर वापसी से अधिकारी वर्ग बैकफुट पर?
सहायक अभियंता जीवेक द्वारा तहरीर वापस लेने और उसमें ‘उच्चाधिकारियों’ के निर्देश का जिक्र करने से निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। इस घटनाक्रम ने पूरे प्रकरण को और अधिक उलझा दिया है, क्योंकि अब यह लड़ाई सीधे तौर पर जनप्रतिनिधि बनाम अधिकारी (Bureaucracy vs Public Representatives) की शक्ल ले चुकी है।
पार्षदों के परिजनों ने उठाए सवाल
वार्ड-50 की पार्षद सुनीता चौहान के पुत्र मनोज सिंह चौहान और वार्ड-96 के पार्षद प्रतिनिधि ने सवाल उठाया कि क्या अपनी मां या परिजनों का जनहित के कार्यों में सहयोग करना अपराध है? जलकल विभाग कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष अमर डागौर ने भी खुद को संदिग्ध श्रेणी में रखे जाने पर आश्चर्य और आपत्ति जताई है।
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