मनुष्य जन्म जितना प्रयासों से मिला है जितना परिश्रम से मिला है उसका मूल्यांकन किया नहीं जा सकता। मनुष्य एक संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव है। संज्ञी यानी जिसका मन हो। सारा खेल मन का ही है। साधु जीवन में भी केवल वेश परिवर्तन सब कुछ नहीं है, मन का परिवर्तन भी जरूरी है। केश लुंचन के साथ साथ क्लेश लुंचन भी आवश्यक है।
कंप्यूटर में importance किसकी है? सॉफ्टवेयर की या हार्डवेयर की? यदि computer में programming नहीं हो तो? शरीर हार्डवेयर है मन सॉफ्टवेयर है। मन बंदर की तरह चंचल है जो स्थिर नहीं रहता है। आज धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा सब कुछ हमारे हिसाब से मिला है। कल ये सब नहीं होगा तो? इसीलिये मन को अपने अधीन रखना आवश्यक है। मन नौकर है आत्मा मालिक है। जब मन मालिक बन जाए, आत्मा नौकर हो तो क्या सब कुछ ठीक हो सकता है ?
एक राजा ने अपने नौकर से खुश होकर कहा जो चाहो सो मांग लो ? नौकर ने कहा एक दिन के लिए अपना राज्य दे दो। राजा ने नौकर को एक दिन के लिए राज्य दे दिया। नौकर ने हुक्म दिया इसको फांसी पर चढ़ा दो। कहने का तात्पर्य है कि जिसको नौकर होना चाहिये जब उसे मालिक बना दिया जाए तो ऐसे ही परिणाम देखने को मिलेंगे।
किसी के प्रति द्वेष का भाव रखना तामसिक वृति है। तंदुल मच्छ जो चावल के आकार का समुद्री जीव है, वो संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव है, अर्थात उसका मन होता है जो अपने तामसिक मन के कारण ही सातवीं नरक में जाता है। ये न में कई बार मगरमच्छ और बड़ी मछली के मुँह में जाता है लेकिन अपने छोटे आकार की वजह से उनके मुँह से वापस भी आ जाता है। मन के कारण वह जीव हमेशा यही विचार करता है इसकी जगह मैं होता तो अपने शिकार को ऐसे ही जाने नहीं देता? जितनी कम पर्याप्ति एवं इंद्रियां होंगी कर्म का बंध उतना ही कम होगा। संज्ञी प्राणी यानी जिनका मन होता है वो नरक गति में ज्यादा जाते हैं। आप तो यही कहेंगे नरक होता क्या है ये कोरी कल्पना है।
क्रांतिकारी संत तरुण सागर जी कहा करते थे नरक देखना हो तो उसके लिए मरने की जरूरत नहीं है, कत्लखाने में चले जाओ, नरक के दर्शन हो जाएंगे। हम जो cosmetic का प्रयोग करते हैं उसमें जानवरो का अंश होता है। कितनी भयंकर हिंसा करते हैं। अपने शरीर को सजाने के लिए हम कितनी भयंकर हिंसा करते हैं? हम जो भी करते हैं उसका भुगतान करना ही होगा। कत्लखाना नरक की प्रतिकृति है।
सीता ने पूर्व भव में एक साधु पर कलंक लगाया। अगले भव में उसका भुगतान सार्वजनिक रूप से कलंक के रूप में सामने आया। एक साधु ने गलत काम किया उसके लिए सारे साधुओं को आरोपित करना, उन पर कलंक लगाना निकाचित कर्म का बंधन है।
सामाजिक संस्थाओं में जो लोग काम करते हैं उनसे गलतियां होना भी स्वाभाविक है । उनके निःस्वार्थ योगदान को देखने की बजाय उन पर आरोप लगाना, उनको नीचा दिखाना सही मायने में देखा जाए तो स्वधर्मी भाई की आशातना करना है। तीर्थंकर भी जब समोशरण में विराजमान होते हैं तो “नमो तिथस्य” बोलते हैं। श्री संघ भी एक तीर्थ है। संघ को पच्चीसवां तीर्थंकर कहा गया है। स्वधर्मी भाई की आशातना करना उचित नहीं हैं। यदि हमने किसी पर आरोप लगाया तो ये शृंखला चलती रहेगी कहीं तो इसको break करना होगा।
हमारा गुण दृष्टि का विकास होना चाहिए, दोष दृष्टि से पतन होना निश्चित है।बिल्ली रात भर चूहे के लिए घूमती रहती है। हिंसानुबंधी रौद्र ध्यान उसका चलता रहता है। यदि आपके तामसिक मन के कारण आपकी गति भी बिल्ली की हो जाय तो फिर क्या करेंगे? हम आज ही संकल्प लें कि हम साधर्मिक आशातना का पाप नहीं करेंगे।
तामली तापस ने 7 हज़ार वर्ष तक उग्र तप किया लेकिन कुछ प्राप्ति नहीं हुई । फिर एक जैन मुनिराज से आत्म बोध पाकर सम्यक् दर्शन को प्राप्त किया। एक टॉर्च की रोशनी गटर की गंदगी की तरफ गयी। वहाँ का दृश्य आप सोच सकते हैं ? उसी टॉर्च की रोशनी एक बगीचे में गयी वहां का दृश्य मनोहारी फूलों का था। ये हम पर निर्भर करता है हम अपने मन की रोशनी को किस ओर divert करते हैं। मन ही मोक्ष का कारण है मन ही नरक का कारण है। निंदा करने से पुण्य नहीं पाप बढ़ेगा। निंदा करना अठारह पाप स्थानकों में अभ्यख्यान पाप होता है।
धार्मिक यात्रा बाद में पहले अधर्म को छोड़ें । परमात्मा भी फरमाते हैं पूजा का फल चित्त की प्रसन्नता है। जब केंद्र में आत्मा हो तो सभी “जीव करूं शाशन रासि” ये सोच ये भाव तीर्थंकर गोत्र का बंध कराती है। किसी के सुख में सुखी होना ये तात्विक वृति है। जितनी इच्छाएं होगी हम उतने दुखी होंगे। साधु साध्वी जी के पास कुछ भी नहीं है फिर भी वह सुखी हैं।
मन की अतृप्ति मन का स्वभाव है। जितना मिले उतना कम है। समता हर परिस्थिति में होनी चाहिए । हम एयर कंडीशनर में रहते हैं पर सचमुच बाहरी शीतलता नहीं आंतरिक शीतलता होनी चाहिये। अपने स्वभाव को ही एयर कंडीशनर बनायें। बीमार होने पर दवा भी जब काम करेगी जब आपके अंदर सता वेदनीय कर्म का stock है। बाहर से अच्छा दिखना और वास्तव में अच्छा होना प्रायः दोनों अलग अलग बात होती हैं।
रायपुर के एक हार्ट शिविर में जब पूज्य गुरूवर्या ने डॉ. रामचंद्रन से प्रश्न किया आपका इतना नाम है, बाहर आप इतने सफल दिखाई देते हैं, घर में भी आप इतने सफल हैं क्या? डॉ. रामचंद्रन ने जबाब दिया मेरी दी आंखे हैं- एक मेरी माँ और एक मेरी पत्नी। दोष दृष्टि छूट जाए गुण दृष्टि का विकास हो, यही मंगल कामना है।
जैन साध्वी वैराग्य निधि
(आगरा में चातुर्मास कर रही हैं)
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