नई दिल्ली/वांग नोई। थाईलैंड में ताड़पत्र (ताड़ के पत्तों) पर अंकित अति प्राचीन बौध साहित्य को सुरक्षित करने, उसके अध्ययन-शोध और उसे आम लोगों के बीच लाने का प्रयास शुरू हुआ है। इसके लिए थाई लैंड में अयूथया प्रांत के वांग नोई स्थित एमसीयू के रेक्टर बिल्डिंग में भारत के राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (National Mission for Manuscripts), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (Indira Gandhi National Centre for the Arts) और थाई लैंड की एमसीयू (चियांग माई परिसर) के बीच एक सहमति बनी।
इस अवसर पर एमसीयू के रेक्टर प्रो. (डॉ.) फरा धमवज्रबंडित की मौजूदगी में सहमति पत्र पर इंदिरा गांधी कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और एमसीयू के वाइस रेक्टर फरा विमोलमुनि ने हस्ताक्षर किए।
नई दिल्ली में इंदिरा गांधी कला केंद्र के मीडिया नियंत्रक अनुराग पुनेठा ने उक्त जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि इस समझौते के तहत उक्त साहित्य का डिजिटलीकरण भी किया जायेगा। राष्ट्रीय कला केंद्र इसके लिए एमसीयू के चियांग माई परिसर में एक संरक्षण प्रयोगशाला का भी निर्माण करेगा।
ज्ञातव्य है कि दक्षिण पूर्व एशिया में ‘भारत प्रभावी देशों’ के रूप में थाईलैंड के साथ लाओस, कंबोडिया, म्यामार जैसे देशों के नाम लिए जाते हैं। इन देशों से भारत के लगभग दो हजार वर्ष पुराने सम्बंध हैं। यह भी प्रमाण मिलते हैं कि सम्राट अशोक ने अनेक बौध भिक्षुओं को थाइलैंड भेजा था। संस्कृत और पाली से थाई भाषाओं में अनुवाद किया हुआ सारा साहित्य वहां मूल रूप में मौजूद है। साल 1947 में भारत की आजादी के बाद जिन देशों से उसके शुरुआती सम्बंध बने, उनमें थाईलैंड भी शामिल रहा। पिछले कुछ वर्षों में तो दोनों देशों के बीच न केवल सांस्कृतिक-सामाजिक बल्कि समुद्री बंदरगाहों के जरिए व्यापारिक और रणनीतिक रिश्ते भी बने हैं।
प्राचीन सुवर्णभूमि, थाइलैंड से भारत के रिश्ते को सिर्फ सरकारों ने ही नहीं बल्कि इन्हें इतिहास के हर पल ने, इतिहास की हर घटना ने विकसित व विस्तृत किया है और नई ऊंचाइयों तक पहुंचा है। हजारों साल पहले दक्षिण पूर्वी एशिया के साथ समुद्र के रास्ते जुड़े, हमारे नाविकों ने तब समुद्र की लहरों पर हजारों मील का फासला तय करके समृद्धि और संस्कृति के जो सेतु बनाए वो आज भी विद्यमान हैं।
– Legend News
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