​यूपी के अस्पतालों में दवाओं की अंधेरगर्दी: 74 रुपये का इंजेक्शन 4,980 रुपये में बिक रहा, एफएसडीए की छापेमारी में हुआ बड़ा खुलासा

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उत्तर प्रदेश के सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थानों में इलाज के नाम पर मरीजों से हो रही अंधेरगर्दी का एक बड़ा मामला सामने आया है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) द्वारा की गई ताबड़तोड़ छापेमारी और उसके बाद सामने आए आंकड़ों ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। स्थिति यह है कि प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और प्राइवेट अस्पतालों की 214 फार्मेसियों में दवाओं की खरीद मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच भारी-भरकम अंतर पाया गया है।

जांच में कई ऐसी जीवनरक्षक दवाएं मिली हैं, जिनकी कीमत उनकी वास्तविक खरीद से 67 गुना तक ज्यादा वसूली जा रही थी। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर चल रहे इस खेल के बावजूद एफएसडीए की ओर से फिलहाल केवल नोटिस जारी करने की औपचारिकता निभाई गई है, जिसके चलते आम जनता की गाढ़ी कमाई पर हो रही इस खुली लूट को लेकर सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

जांच में सामने आया खरीद और एमआरपी का भारी अंतर

एफएसडीए द्वारा प्रदेशभर की 214 फार्मेसियों से जुटाए गए पुख्ता आंकड़ों के आधार पर करीब 130 प्रमुख दवाओं का विस्तृत विश्लेषण किया गया। इस दौरान चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि विश्लेषित की गई दवाओं में से 36 दवाएं ऐसी थीं, जिनकी खरीद कीमत से भी अधिक उनकी एमआरपी दर्ज की गई थी। इसके अलावा, कई क्रिटिकल केयर दवाओं के मामले में खरीद मूल्य और एमआरपी के बीच 67 गुना तक का भारी अंतर देखा गया। इस जांच के दायरे में वे सभी दवाएं और इंजेक्शन शामिल थे, जिनका उपयोग गंभीर संक्रमण, आईसीयू में भर्ती मरीजों और अन्य जटिल तथा आपातकालीन चिकित्सकीय परिस्थितियों में किया जाता है।

​74 रुपये का इंजेक्शन बिक रहा 4,980 रुपये में

दवाओं की कीमतों में मुनाफाखोरी का यह आलम है कि बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज में काम आने वाले ‘पॉलिमाइक्सिन-बी’ इंजेक्शन की खरीद कीमत महज 74.09 रुपये थी, जबकि उसकी एमआरपी 4,980.94 रुपये दर्ज पाई गई। यानी अस्पताल या फार्मेसी द्वारा इसकी कीमत खरीद से करीब 67 गुना अधिक वसूली जा रही थी। इसी तर्ज पर, लीवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोग होने वाले एक अन्य इंजेक्शन की खरीद लागत महज 56 रुपये थी, लेकिन उसकी एमआरपी सीधे 3,050 रुपये प्रिंट की गई थी।

मेडिकल उपकरणों के दाम भी आसमान पर

केवल दवाएं ही नहीं, बल्कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले सर्जिकल और मेडिकल उपकरणों की कीमतों में भी भारी गड़बड़ी उजागर हुई है। जांच में पाया गया कि एक ‘थ्री-वे स्टॉप कॉक’ (Three-way stopcock) की खरीद कीमत केवल 6.40 रुपये थी, जबकि मरीजों को उसकी एमआरपी 163 रुपये तक लगाई जा रही थी, जो खरीद लागत से करीब 25 गुना ज्यादा है। इसी तरह, एक अन्य चिकित्सा उपकरण की खरीद कीमत 20.95 रुपये थी, जिसके मुकाबले उसकी एमआरपी 500 रुपये यानी लगभग 24 गुना अधिक वसूली जा रही थी।

​निजी अस्पतालों की मोनोपॉली से बढ़ रहा इलाज का खर्च

पड़ताल के दौरान यह भी एक बड़ा तथ्य सामने आया है कि निजी क्षेत्र के अस्पताल अपनी फार्मेसियों में ऐसी विशेष दवाएं रखते हैं, जो आमतौर पर खुले बाजार या सामान्य मेडिकल स्टोर्स पर आसानी से उपलब्ध नहीं होती हैं। ऐसी स्थिति में मरीजों और उनके तीमारदारों के पास अस्पताल परिसर की उसी फार्मेसी से दवाएं खरीदने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। इस मजबूरी का फायदा उठाकर अस्पताल संचालक इन दवाओं पर अपनी मर्जी से भारी-भरकम एमआरपी तय कर देते हैं। चूंकि बाजार में उस दवा का कोई दूसरा विकल्प या खुला विकल्प नहीं मिलता, इसलिए मरीज चाहकर भी उसकी असल कीमत की तुलना नहीं कर पाते और उन्हें मुंहमांगे दाम चुकाने पड़ते हैं।

कैंसर और फंगल संक्रमण की दवाओं में भी खुली लूट

गंभीर और जानलेवा बीमारियों से जुड़ी दवाओं का हाल भी इससे जुदा नहीं है। फंगल इन्फेक्शन के इलाज में इस्तेमाल होने वाली ‘कैस्पोफंगिन 70 एमजी’ दवा के एक उत्पाद की खरीद लागत 800 रुपये थी, जबकि उसकी एमआरपी 21,230 रुपये यानी खरीद मूल्य से लगभग 26.5 गुना अधिक पाई गई। इसी दवा के दूसरे ब्रांड की खरीद 897.75 रुपये थी और एमआरपी 19,892 रुपये दर्ज थी।

इसके अलावा, कैंसर जैसी घातक बीमारी के इलाज में उपयोग होने वाली महंगी और जीवनरक्षक दवाओं के दाम में भी भारी अंतर मिला है। ‘बेवाकिजुमैब 400 एमजी’ इंजेक्शन की खरीद कीमत 7,541.10 रुपये थी, जबकि उसकी एमआरपी 69,995 रुपये रखी गई थी। इन दोनों कीमतों के बीच सीधा 62,453.90 रुपये का भारी-भरकम अंतर देखा गया। इसके साथ ही इनोजा, सिम्युलेक्ट और कीटूडा जैसे महंगे इंजेक्शनों के दाम में भी भारी विसंगतियां पाई गईं हैं।

Dr. Bhanu Pratap Singh