नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी मुल्ला अफरोज की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA – राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980) के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। मुल्ला अफरोज पर वर्ष 2024 में हुई संभल हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया गया था। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस पूर्व आदेश को भी पलट दिया है, जिसमें उसके डिटेंशन ऑर्डर को सही ठहराया गया था।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच का फैसला
मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने स्पष्ट किया कि प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के लिए केवल ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन’ (न्यायालय के बाहर किया गया कबूलनामा) ही एकमात्र और पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
कोर्ट ने कहा कि हिरासत में लेने वाले अधिकारियों को अन्य सभी प्रासंगिक परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए था, जो इस मामले में नहीं किया गया। अदालत ने इसे शक्तियों का गलत इस्तेमाल माना और सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया।
क्या था पूरा मामला?
संभल में शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-ऑर्डर सर्वे के दौरान हुई हिंसा में चार लोगों की मौत हो गई थी। इस हिंसा के करीब 54 दिन बाद मुल्ला अफरोज को पुलिस कस्टडी में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। हालांकि, बाद में उसे हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी, लेकिन 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ एनएसए (NSA) के तहत डिटेंशन ऑर्डर जारी कर दिया गया था। हाईकोर्ट द्वारा इस आदेश को सही ठहराए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि केवल पुलिस कस्टडी में दिए गए बयानों या कई आपराधिक मामलों का दर्ज होना ही किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखने का आधार नहीं बन सकता। इसके लिए ठोस सबूतों की आवश्यकता होती है। अदालत ने ‘रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य’ और ‘अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य’ के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए राज्य सरकार के तर्कों को खारिज कर दिया और मुल्ला अफरोज को राहत प्रदान की।
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